
मानव का चटोरा मन और स्वाद की जिव्हा चटकार उसे अद्भुत जीव बनाती है… मन का नियंत्रण और निर्णय लेने की क्षमता पर विचार करें तो जीवन में उत्पन्न स्थितियों का प्रसंग कुछ इस प्रकार बताया जा सकता है –
टाईम पास मूंगफली के सबसे पहले खाने के लिए सुडोल सुदृढ़ और सुंदर मूंगफली के दाने चुन -चुनकर उदरस्थ कर लिए जाते हैं और उनके खत्म होते ही छोटे और फिर अंत में टुकड़े भी नहीं बचते हैं,सब समाप्त हो जाते हैं.
आश्चर्य इस बात का होता है कि खाने के आरंभिक दौर में कोई भी व्यक्ति गरीबों का काजू कहलाने वाली मूंगफली के कोई टुकड़े या छोटे दाने नहीं उठाता है और पूर्ण रूप से साबुत और सजे मूंगफली के दाने ही मुंह में रखे जाते हैं. वहीं सादी मूंगफली के दाने के साथ यदि नमकीन मूंगफली भी प्रस्तुत हो तो सबसे पहले स्वादिष्ट नमकीन दाने समाप्त हो जाते हैं…बेचारे सादे मूंगफली दाने बचे रह जाते हैं. हालांकि धीरे धीरे वे सादे दाने भी खा लिए जाते हैं.
सही कहा न!
और यही अन्य स्थिति में
मूंगफली के सादे दानों के साथ साझेदारी में काजू रखे हो तो काजू पहले समाप्त हो जाते हैं.
क्या काजू कुलीन हैं?
काजू और बादाम एक साथ परोसे से जाने की स्थिति मानव मन की कमजोरी के चलते काजू पहले खा लिये जाते हैं.
कदाचित!
एक अन्य स्थिति में सादे काजू और नमकीन काजू दो कटोरी में अगल-बगल में रखे जाए तो नमकीन काजू पहले समाप्त हो जाते हैं.
क्यों?
नमक से मीठा कुछ नहीं है?
आखिर ऐसा होता क्यों मानवीय मनोविज्ञान को दृष्टिगत रखते हुए यदि समझने का प्रयास किया जाए तो मानव मन को भला लगने वाली स्थिति को चुनने का हामी है परंतु अंत तक कोई भी स्थिति से समझौता करने को भी हामी है.
Received comment from my friend Abhishek Joshi.
सटीक आकलन है सर… आजकल जीवन में इंसान भी इंसान को पहले उसकी बाहरी पसंद और दिखावे के आधार पर ही चुनता है—चाहे वह दोस्ती हो या रिश्तेदारी। दिखावा और स्वाद ही प्राथमिकता बन गए हैं। जैसे लोग साधारण मगर पौष्टिक मूँगफली को छोड़कर पहले सुंदर दिखने वाले काजू को चुनते हैं। और जब जीवन के किसी मोड़ पर कोई साथ नहीं देता, तब वही मूँगफली का दाना भी काजू से कम नहीं लगता।
comment from ashish mehta
रोचक अवलोकन के लिए साधुवाद। चटोरा ‘मन’….., पहली बार पढ़ने पर लगा, चटोरापन। कई लोग ‘चटोरे’ नहीं होते हैं… मन को साध पाते हैं, पर शायद वे भी मूंगफली के दानों को ‘उसी’ क्रम में उदरस्थ करें। मन की कमज़ोरी और मन की मजबूती का माप यदि हो पाता, तो शायद नम्बर-लाइन जैसा ही होता…’अपने ही शून्य’ के साथ।
कोई, कुछ दिन, उदर की हड़ताल करे, तो लोग उसे पूजने को आतुर हो उठते हैं… शरीर के किसी अन्य अंग के ऐसे भाग्य नहीं।
जब कुछ लेने (खाने/समेटने) के मामला हो, तो “सर्वश्रेष्ठ” से ‘कुछ न से, कुछ भला’ तक तो ‘मन’ विचरण करता ही है। पर यदि मामला कुछ देने (त्याग/बलिदान) का हो, तो बात सर्वश्रेष्ठ पर ही रुक जाती है। मन मानता नहीं, चाहे फिर जान ही क्यों न देनी पड़े।
सटीक आकलन है सर… आजकल जीवन में इंसान भी इंसान को पहले उसकी बाहरी पसंद और दिखावे के आधार पर ही चुनता है—चाहे वह दोस्ती हो या रिश्तेदारी। दिखावा और स्वाद ही प्राथमिकता बन गए हैं। जैसे लोग साधारण मगर पौष्टिक मूँगफली को छोड़कर पहले सुंदर दिखने वाले काजू को चुनते हैं। और जब जीवन के किसी मोड़ पर कोई साथ नहीं देता, तब वही मूँगफली का दाना भी काजू से कम नहीं लगता।
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Worthy comment
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बिल्कुल सही। इस भागदौड़ भरी जिंदगी में सर्वप्रथम व्यक्ति उपरी दिखावे से बेहद प्रभावित होता है।लंबे समय के अंतराल में ही जीवन के सही निर्णय लिए जाते हैं। काजू के साथ मूंगफली भी काजू जितनी ही उत्तम और महत्वपूर्ण है यह अंतिम निर्णय।।
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🙏🏽
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