ये दुर्गा, दे डंडा! Blog No 457.
महिला, उम्र 28 बरस,
बारहवीं पास.
तीन बच्चे दो लड़कियाँ एक छोटा सा बेटा.
महिला टीबी रोग से पीड़ित.
महिला का उपचार जारी
और
कमज़ोरी रहने की हमेशा की शिकायत.
क्षय रोग चिकित्सालय में मरीज़ों में से एक परिदृश्य-
पति की शिकायत कि घर का आधा काम मुझे करना पड़ता है
और
बीमारी के कारण ये मेरी पत्नी हमेशा बिस्तर पर ही पड़ी रहती है.
मज़दूर आदमी हूं, छुट्टी नहीं कर सकता हूँ और ये बीमार रहती है अपने से यह अस्पताल में भी नहीं आ पाती है.
1 दिन की छुट्टी ले लूँ तो मुझे 250 रुपया का नुक़सान हो जाता है और जब तब इसे उपचार के लिए अस्पताल भी लाना पड़ता है
डॉक्टर ने विस्तार से परीक्षण किया और कहा,
अच्छा. अभी तो मैं ख़ुद इंजेक्शन लिख रहा हूँ रोज़ आकर लगवा लोगे तो जल्दी आराम हो जाएगा और हम चिकित्सक यहाँ रोज़ उपचार की प्रगति भी देख लेंगे.
पति ने भी बोलना जारी रखा-
रोज़ तो मरीज को नहीं ला पाएंगे छुट्टी कर के आना पड़ता है .
तो डॉक्टर ने भी कह दिया कि
तुम करो नौकरी अभी स्कूलों की छुट्टी भी है पास की कॉलोनी में ही रहते हो ना, तुम सो पास ही तो है इस बच्ची को अकेले ले आने दो.
पति-पत्नी चुप.
पति, पत्नी का मुख देखे पत्नी पति का. ऐसे में संशय की स्थिति देख चिकित्सक ने पूछ लिया, क्यों क्या परेशानी है?
तो महिला ने संवाद के बागडोर संभाली. कहा सर में अकेले नहीं आ सकती हूं.
डॉक्टर ने पूछ लिया क्यों ? तुम तो पढ़ी लिखी है क्या डर लगता है ?
हाँ सर डर लगता है
डॉ . ने पूछ लिया किससे! बोलो बोलो
महिला ने कह ही दिया सर रास्ते में कुत्ते खड़े रहते है जो लपकते हैं हमारे ऊपर.
डॉ ने धीमी आवाज में पूछ लिया, अच्छा कुत्ते लपकते भी हैं और छेड़ते भी है ! सही है ना ?
सन्नाटा निपट सन्नाटा
तभी न जाने कैसे, चिल्ला पड़े डॉक्टर.
ये दुर्गा है दे इसके हाथ में डंडा दे.
पति की ओर संबोधन करते हुए डॉक्टर ने तेज स्वर में कहना जारी रखा. आस पास खड़े अन्य मरीज भी सुनने लग पड़े.
डंडा हाथ में होगा तो छेड़ना तो दूर की बात है वे देखेंगे भी नहीं. उसको मज़बूत नारी बना जो अपनी और बच्चों की सुरक्षा कर पाए. मज़बूत बन और अपनी मज़बूती प्रदर्शित भी कर. ये दिखावे की दुनिया है इस नारी को डंडा दे हाथ में और इसे चंडिका बना… दुर्गा बना. पिटाई किसी की नहीं करना है लेकिन कुत्ते 4 पैर के हों या दो पाँव के, सड़क पर चलो तो महिला के हाथ में डंडा सब को दिखना चाहिए. फिर जो एक बार साख बन गई और न कोई कुत्ता लपकेगा ना कोई बदमाश छेड़ेगा, सम्मान अलग करेगा. दीदी छोड़ किसी अन्य संबोधन से बात नहीं करेगा. भय का सम्मान है कि महाकवि तुलसीदास जी कह गए हैं 500 बरस पहले कि भय बिनु होइ न प्रीति. आयी समझ में कुछ!
सिर हिला दिया पति और पत्नी ने. डॉ ने कहना जारी रखा
और हाँ डंडा मज़बूत होना चाहिए साथ में. बेंत, बुढ़ापे के सहारे वाली लकड़ी नहीं ये सब कमज़ोर है और 1 बार मारा कि टूट जाएगी. 3 साढ़े तीन फुट लंबा तेल पिलाया हुआ मज़बूत और ठोस डंडा होने का और जब बाहर अकेले निकलो को साथ ले लो. दिखना चाहिए दीदी के हाथ में डंडा है दीदी दबंग हैं और अपनी और अपने परिवार की रक्षा में ये संदेश मुखर है. हाथ में डंडा एक पूर्ण वाक्य है.
और जब हमला वो पहली बात तो पूरी ताक़त से मारना. आत्मरक्षा में मारना कोई अपराध नहीं है. और ज़ोर से चिल्लाना ताकि आस पास के लोग सुन ले. बदमाश की ताक़त है नारी की ख़ामोशी और नारी के चिल्लाने से ये बदमाश भागने को मजबूर हो जाते हैं. आया समझ में कि नहीं.!
ओपीडी में आसपास खड़े महिला पुरुष मरीज़ भी सहमति में सिर हिला दिये. एक वृद्ध तो बोल भी दिए कि डंडा रखने में कोई लाइसेंस भी ज़रूरी नहीं है और डंडा रखने से कोई अपराध नहीं बनता है और आत्मरक्षा मैं आप इसका चाहे जैसा उपयोग कर सकते हैं.
परिवर्तन देखने लगा कुछ ही दिन बाद वह रोगी महिला इंजेक्शन लगवाने आने लगी. दुर्गा के हाथ में एक डंडा भी था उसके हाथ में दूसरे हाथ में छोटा बच्चा भी था
मेरा देश बदल रहा है.

A nice example to propagate a very imp advise….self defence is so imp for a woman
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शक्तिमान समाज निर्माण के लिए नारी का सशक्तीकरण मूल आधार है l यह समय की आवश्यकता है l
घटनाक्रम यथार्थ को चित्रित करता है और परिस्थिती से संघर्ष का मार्ग दिखाता है l उत्तम प्रस्तुति है l साधुवाद 🙏
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आभार आदरणीय
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🙏
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