
एक समय आता है जब मन, विचार, सोच और मन के भाव में एक नई अवस्था उत्पन्न होती है.
मित्र, मुमुक्षु पुरुष तो वही है जिसकी न पकड़ अब भोग की है और ना योग की है जिसने जान लिया कि सब सपना है सब मिथ्या है और जो भी है वह माया की लीला है, अब भागना कहाँ है.
ना भोगना है न भागना है अब तो बस जो वो उसे देखते रहना है अब तो साक्षी भाव में जीना है. मन की इच्छा जैसा हो तो ठीक ना हो तो ठीक.
कुछ हो तो ठीक कुछ न हो तो ठीक.
महल हो तो ठीक झोपड़ी हो तो ठीक.
यह है वीतराग!
वीतराग, चित्त की दशा भोग और त्याग की दशा के पार की दशा है क्योंकि भोग भी एक सपना है और त्याग भी एक सपना है दोनों में से जो जाग गया वही साक्षी है.
A state of spiritual attachment & worldly detachment brings inner peace.
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