
धीमे चलोगे , आगे रहोगे !!!
विरोधाभास, जीवन का विशिष्ट मानस दृष्टिकोण है जो जाम फल (अमरूद/बीही) ख़रीदते समय मीठे जाम फल की माँग करता है उसके बाद चाक़ू से काटकर नमक-मिर्च लगाकर खाता है.
अरे जब मीठा खाना था तो नमक-मिर्च क्यों लगाया? और जब अमरूद नमक मिर्च लगाकर ही खाना था तो मीठा अमरुद क्यों पाया? विचित्र मन है ना!
विरोधाभास मस्तिष्क की ऐसी व्यवस्था है कि शरीर सुख, मन-सुख और समाज में साख-सुख के लिए बड़ी सुंदर, उच्च ब्रांड की और महँगी कार ख़रीदता है और उसके बाद जब ट्रैफिक जाम में फँसा हो, तो दुखी होता है जबकि वह अपनी पसंदीदा कार में बैठकर आनंदित भी रह सकता है. अदभुत है ना!
विरोधाभास भी बड़ा अजीब प्रस्तुतीकरण है जब नए वस्त्र क्रय करते समय ट्रायल कर और समुचित फ़िटिंग कराकर वस्त्र ख़रीदा जाता है और कवर में रखकर अलमारी में रख दिया जाता है कि किसी बड़े आयोजन पर इसको पहना जाएगा. और वास्तव में नया कुलीन वस्त्र भी छह-आठ माह तक धूल खाता रहता है. आश्चर्य जनक है ना!
विरोधाभास की लीला व्यक्तिशः परमाण्विक स्तर पर प्रदर्शित होती है जब मानव रूपी लव -बर्ड्स अपने प्यार को देख विवाह रचा लेते हैं फिर जीवन भर लड़ा करते हैं! यहाँ तक कि तलाक़ की नौबत आ जाए इतना लड़ता है!
जहाँ व्यक्ति से प्रेम करना हो तो वह व्यक्ति का उपयोग करता है जबकि वस्तु या पदार्थ से प्रेम कर बैठता है जिसका उपयोग करना चाहिए. ऐसा विचित्र अब विरोधाभास का मानस!
विरोधाभास तो यह भी है कि पैसे कमाने के लिए मानव अपने स्वास्थ्य के चिंता न करते हुए स्वास्थ्य में हानि कर लेता है और फिर स्वस्थ शरीर पाने के लिए शल्यचिकित्सा या जिम या या साइकिलिंग और स्विमिंग मैं पैसे ख़र्च करता है. मिथ्याभास है ना?
विरोधाभास का विरोध लगभग असंभव है क्योंकि मानव स्वभाव है कि जिस परिस्थिति में वह रहता है उसके विपरीत ही उसका मानस कार्य करता है.
विचार कीजिए!
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