A Poem Blog 445

जो तुम मुस्कुराओ
बैठे बैठे अकेले अकेले
दिखोगे तुम कुछ पागल
कुछ अबोले अलबेले
क्यों यार बैठा सन्नाटे में
मोहित मुदित हो रहा था
ऐसा क्या है उसके मन में
जो ख़ुद ही ख़ुश हो रहा था
क्या स्थिति हो जो एकल ही
ख़ुद से कैसे हर्षित हुआ जाए
जैसे क्यों पूछा भगवान ने ही
मानव से कैसे बचा जाये
मिली सलाह भगवान को कि
मानव मन में बस आ जाये
और तब से कुछ ऐसा हुआ है
भगवान मानव मन में बसे आये
खोजी मानव बाहर घूमे पड़ा है
नियम छोड़ ऐसे आगे बढ़ा करो
अपनी संगत में ख़ुद से ही यूं
कुछ अनमोल बातें किया करो
और जो वो ख़ुद से बात करोगे
अंतर्मन में क्यों नहीं मुस्कुरा दोगे
जटिल द्वैत भूल, अद्वैत से
एक संगत भी बिठा लोगे
अंतर्मन की ज़मीन से होती चर्चा
बारिश जैसे होती बिना खर्चा
और जैसे तुम अपने बात करोगे
जैसे खुलगया हो परीक्षा का पर्चा
शांत हो कि अशांत मन
साधु मन हो कि दंगा मन
मन मनांतर की बात सुन
मन ही मन मुस्कुरा दोगे.
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