Bad Me!

Blog No. 444

क्लब में बैठे मित्रों के संग नाश्ता करते एक मित्र ने मेरी आलोचनात्मक व्याख्या कर दी और पहली बार मुझे अपने भीतर उपस्थित सैकड़ों बुराइयों का आईना दिखा. सहर्ष स्वीकारते हुए आत्म विवेचन को उद्यत मैं अपने आप में विद्यमान कमियों के सागर में गगरी से भर भर एक एक बुराई के आंकलन को प्रस्तुत हुआ तो प्रतीत हुआ क्यों कबीर ने लिखा था कि निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाये!

अफ़सोस यह है कि हम बुराइयों के अटल सागर में डूबते उतराते निंदक के आलोचनात्मक आंकलन से ही घृणा कर बैठते हैं. यह बात भिन्न है कि निंदक का चरित्र आदतन है या शुभ चिंतन है यह विचार का विषय है….

बुराइयाँ मानव जीवन का अभिन्न अंग है और बचपन की मानसिक शुद्धता में जवान होते होते अशुद्धि का अनचाहा तड़का लगाते जाते हैं जिसे सामाजिक व्यवस्था मैं धीरे धीरे समय की धीमी आँच में न केवल सेंका जाता है बल्कि झूठ,धोखा, फरेब और लोभ की सोंधी अपितु नशीली महक का आनंद भी लिया जाता है. वयस्क होते होते आदम जाती के बाशिंदे अहंकार क्रोध एवं आत्ममुग्धता के विभिन्न बुराइयों के तत्वों से आलोकित होते जाते है बल्कि एक दूसरे से तुलना में आगे निकलना है और सदैव प्रतियोगिता करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं.

बुराईयों की विशेषता है कि मानव मन में इनकी उपस्थित कस्तूरी मृग की महक की भाँति व्यक्ति को स्वयं नहीं दिखाई पड़ती है जब तक कि कोई शुभचिंतक उन्हें स्वयं आपके सामने थाली में परोस कर साक्षात्कार ना करा दे. और इस घटनाक्रम है यदि आप में बुराइयों के आईने में अपने आप को देखते हुए खेल भावना से नहीं लिया तो आप बुराइयों से वशीभूत हो चुके हैं. बुराइयों का छद्म आवरण निरंतर की जा चुकी गलतियों के खेत खलिहान से ढका होता है.

अनजाने में की गई पहली गलती से गलती का एहसास होता है जबकि दूसरी बार की गलती जानबूझकर झिझकते हुए की गई होती है तो तीसरी बार गलती करने की अनजाने में ही आदत से हो जाती है. चौथी बार की गई गलती तो यूं होती है कि होने दो कौन देख रहा है.

और पांचवें गलती के बाद तो कहीं न कहीं अपनी चतुराई स्मार्टनेस और अहंकार आ जाता है कि कौन रोकेगा हमें और दसवी बार की गई गलती होने तक तो आदत कुछ इस तरह पड़ चुकी होती है कि वह बुराई में बदल जाती है और यही आदत आपके आस पास यदा कदा निंदक को भी प्रस्तुत करती है जिसे गलती करने वाला मानस स्वीकार नहीं कर पाता है.

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