Kashi

Travelogue (Blog : 383)

आउटलुक हिंदी पाक्षिक के फ़रवरी ०३, २०२५ को प्रकाशित

अनादिकाल से काशी, मन के आग्रह और पूजन का स्थल रहा है. विसर्जन की इस धरा का महात्म्य इस की मिट्टी के कण कण में प्रतीत होता है रहा है यहाँ तक कि शिवा पार्वती के भी यहाँ आकर रमण और विहार करने के उद्धहरण प्राप्त है जिसकी महादेव शिवा की स्वयं की काशी हो. काशी का भक्त और सेवक और हर सनातनी एक बार काशी की भूमि के स्पर्श का लोभ में रहता ही है.

काशी का इतिहास लगभग १५००० बरस प्राचीन माना जाता है जो पार्थिव पर उपस्थित किसी भी संस्कृति, काल, राजवंश से पूर्व का है . वाराणसी और बनारस के साथ आनंदन के नाम से प्रसिद्ध यह प्रथम नगर आध्यात्मिक धरातल पर सबसे उच्च शिखर पर स्थित है. काशी का शब्दार्थ ही है जाग्रत अर्थात् प्रकाशित और इसीलिए कदाचित आम भारतीय इस नगरी से मोहित होते हैं.

वाराणसी नाम उत्पन्न हुआ है दो अन्य नदियों अस्सी और वारण की उपस्थिति से जो अंततः गंगाजी में विलीन होती हैं.

श्री गंगा जी के तट पर एक बड़ी श्रृंखला में पक्के घाट स्थापित हैं जो काल के विभिन्न दौर में काशी आए प्रख्यात महानुभावों के नाम पर स्थित हैं. घाटों की यही अनुपम श्रृंखला श्री गंगाजी नदी पर मोटरबोट पर सवार होने पर एक दर्शनीय दृश्य प्रस्तुत करती है. नाव के केवट द्वारा कहीं गई जीवंत कहानी की प्रस्तुति से न केवल घाटों को आसानी से जाना जा सकता है बल्कि घाट के पीछे छुपी कहानी की जानकारी भी प्राप्त होती जाती है.

केदार घाट से नौका विहार आरंभ कर संध्या आरती के अनुपम दर्शन बड़े मनोहारी और लुभावने होते हैं. दशाश्वमेघ घाट तथा राजेंद्र प्रसाद घाट जो साथ में लगे हुए है पर लगभग एक साथ संध्या आरती में नाव पर सवार हो घाट के दर्शन और आरती दर्शन कर आनंदित हुआ जा सकता है.

घाटों की अनंतिम और ऐतिहासिक कथायात्रा का शिरोमणि है श्री गंगाजी की आरती जो दशाश्वमेघ और डा राजेंद्र प्रसाद घाट पर सांझ ६ बजे से आरम्भ होती है. यह एक अद्भुत अनुभव है जब मूर्धन्य पंडितों का सरोकार एक अलौकिक वातावरण उत्पन्न कर देता है. घाट पर बिछे तख्तों पर से श्लोकों का ओजमायी उद्घोष श्रद्धालुओं के मन में उत्साह और शरीर में रोंगटे खड़े कर देता है. घाट और नाव सवार भक्त इस अद्भुत प्रस्तुति को देख आध्यात्मिक ऊर्जा से अछूते नहीं रह पाते हैं.

काशी के सांसद हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत प्रयासों और दूरदृष्टि से बनारस की ऊर्जावान संरचना में परिवर्तन उपस्थित हुआ है और पूर्व के तुलना में सड़क यातायात और स्वच्छता का वातावरण अब स्थापित हो रहा है. भोलेनाथ की जीवंत ज्योतिर्लिंग स्थापना के सुलभ और सुगम दर्शन, भीड़ के बेहतर प्रबंधन से अब आसानी से होये है जो आत्मिक संतुष्टि प्रदान करते हैं. दर्शन उपरांत मंदिर परिसर से गंगा तीरे तक जो नव निर्मित कॉरिडोर स्थापित हुआ है वह अत्यंत आधुनिक और आकर्षक दृश्य प्रस्तुत करता है. इसी कॉरिडोर के कारण काशी विश्वनाथ के ज्योतिर्लिंग स्थापत्य की महिमा बढ़ी है जहाँ विश्वनाथ सीधे गंगा जी को एक सीधी रेखा में प्रस्तुत होते हैं. कॉरिडोर की नवीन अवधारणा में आधुनिक ऑडियो विजुअल प्रस्तुति नाममात्र के शुल्क पर उपलब्ध कराई जाती है जो मंदिर के अवलोकन की एक त्रिआयामी शैली में दर्शनीय है. स्तर पुरुष की लंबी कतार की सुविधा के लिए प्रसाधन, पानी और सहायक स्वयंसेवक उपलब्ध हैं. बिना लहसुन और प्याज से बने अल्पाहार का उडुपी भोजनालय भी भक्तगणों को एक सात्विक वातावरण में सशुल्क शुद्ध भोजन उपलब्ध करा देता है.

इसी कॉरिडोर पर सांयकाल में लाइट एंड साउंड शो की निःशुल्क प्रस्तुति मनमोहक दृश्य से महादेव शिवा और देवी पार्वती के साथ गंगावतरण और अन्य दर्शनीय कथानकों के मन मोह लेती है. यह शो साँझ ७ बजे से उपलब्ध होते हैं जिन्हें गंगाजी पर नाव में सवार हो अथवा घाट की सीढ़ियों पर स्थापित हो देखा जा सकता है.

काशी की स्थापत्य शैली और पुराने क्षेत्र की जीवन शैली आज के आधुनिक मानस के मानवी को आश्चर्य में डाल देती है.

सँकरी गालियाँ और उसमें चलते पैदल नागरिकों के साथ बाइक की गुत्थम गुत्था, तिस पर गली के दोनों ओर दुकाने – कपड़ों की और खानपान चाट पकौड़ी और पान की छोटी छोटी दुकानें टिप पर वाद विवाद का कोई प्रश्न नहीं जैसे सब भोलेनाथ की भाँति अपने में मगन और मस्त.

विश्वनाथ मंदिर के दर्शन कर कोई भी नागरिक आश्चर्य चकित हो सकता है काशी की गलियों को और इन गली में दौड़ते वाहनों को देखकर. आप
परिकल्पना कर सकते हैं कि इन्ही गलियों में कहीं किसी एक गलियारे में आदि शंकराचार्य का महादेव से साक्षात्कार हुआ था जहाँ महादेव ने अंतर्मन की यात्रा का मर्म आदि शंकराचार्य को इंगित किया था.
मुख्य ज्योतिर्लिंग मंदिर से २ किलोमीटर दूर स्थित है काशी नगरी के रक्षक कोतवाल श्री काल भैरव का मंदिर जिनके दर्शन भी अनिवार्य माने जाते हैं.

नमो घाट आधुनिकतम घाट है जहाँ सीएनजी स्टेशन भी स्थापित है जहाँ से गंगाजी में चलने वाली बोट और क्रूज़ सीएनजी की पूर्ति करते हैं. पारिस्थितिकीय संतुलन हेतु इस सोच को निरंतर प्रणाम करने को हृदय द्रवित हो जतलाता है.

आधुनिक और नवनिर्मित नमो घाट एक पूर्ण पैकेज है जहाँ बच्चों बड़ों बूढ़ों सबके लिए कुछ न कुछ है. नमस्कार मुद्रा में स्थापित कलाकृति, सामने प्रज्ज्वल गंगाजी का जल संसार और दोहरे स्तर का पुल जहाँ सड़क और रेलमार्ग दोनों है और जब धीमी गति में ट्रेन गुजरती है तो पुल और आपका हृदय दोनों ही थरथराते महसूस होते हैं. इस नमो घाट की रचना इस सुंदर शैली में की गई है कि काशी के स्थानीय निवासी और आगंतुक लोग इस स्थान पर बार बार आने को ललचायें.

काशी चाट, पहलवान लस्सी, बनारसी पान. सर्दी में मलाइयो और ख़ान पान के विभिन्न व्यंजन की अधिष्ठात्री है काशी जहाँ जिह्वा ग्रंथियों से चटोरे भारतीय अपनी स्वाद क्षुधा को संतृप्त किए बिना नहीं रह सकते है. वाराणसी की पावन धरा किसी भी साधु मनस्वी का मन मोहे बिना नहीं रहा पाती है जो जन्म, जीवन और मृत्यु के तीनों मायावी स्वरूपों से साक्षात्कार कराती है. घाट पर श्मशान की अवधारणा ही इतनी प्राचीन है कि त्रेतायुग में अयोध्या के सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के काल से भी पूर्वे से स्थापित है.

काशी का रस अनिर्वचनीय और अलौकिक है जो जिह्वा पर नहीं बल्कि मानस पर आलोकित होता है. काशी, चेतन और अवचेतन मन के अतिरिक्त अचेतन मन पर भी आघात करती है जो किसमिस भी वयः अवस्था में सुधियाँ को भावनाओं से सराबोर कर देती है. काशी अद्वितीय है जो श्मशान घाट पर गए बिना ही यूँ ही विचरण करते हुए किसी में भी श्मशान वैराग्य पैदा कर देती है. मणिकर्णिका घाट नश्वर शरीर के पंचतत्व में लीन हो जाने का किसी भी सनातनी का अंतिम संस्कार का स्वप्न हो सकता है.

पंचक्रोशी, विनायक और आदित्य नामक यात्रायें भी काशी विश्वनाथ की लोक परंपरा का अभिन्न हिस्सा है जो ज्योतिर्लिंग को केंद्र बिंदु मानकर भक्त गणों द्वारा विभिन्न दूरियों और मंदिरों की स्थापना रचना के इर्द गिर्द सम्पन्न होती हैं .

Vishwanath Temple

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