Sanskar (359)

भारत के संस्कार..

कौन गाँव के हो?
क्यारिपुरा.
सुक्खू सिंह को जानते हो.
मेरे दादा जी के बड़े भाई थे.
अच्छा , साधू बाबा के पोते हो…… अब तो आधी रात है, यहाँ से घर जाने को गाडी न मिलेगी. कुछ खाया है कि नहीं.
जी खा लिया है रस्ते में.
तो जाओ उस खटिया पर सो जाओ. सुबह ६ बजे वाली गाड़ी से निकल जाना.

मध्य प्रदेश के चम्बल नदी के किनारे के फ़ूप बस स्टैंड के छोटे से तिराहे पर, गाँव के एक बुजुर्ग ने मुझ जैसे प्यासे को जैसे पानी पिला दिया कि …..आधी रात को कहाँ जाओगे.
भिंड जिले के चम्बल नदी के बीहड़ों में भारत की धरोहर है भारत के गाँव, जहाँ निश्छल भाव सदैव प्रभावी रहा और लोग अपनों और गैरों की नित सहायता भी करते रहे. शासन रहे, न रहे, सुशासन से कुशासन के बीच डोलता रहे, मानव मन की दया का मूल भाव भारत में सदैव कायम रहा,पल्लवित होता रहा.और इस घोर कलियुग में भी जब आज घर घर भिन्न भिन्न राजनीतिक दलों के झंडे गाड दिए गए है, स्त्री-पुरुष, दलित-कुलीन, सरकारी- असरकारी, हलकों में विभाजित समाज भी प्रेम के मूल भाव से भवसागर में तैरते रहते हैं. नर – सेवा में है नारायण सेवा का पवित्र भाव आज भी हमारे संस्कारों में संतति दर संतति तिरोहित होता रहता है. उक्त घटनाक्रम इसी का उदहारण है. बिना जान पहचान के भी लोग यात्री की निर्मल सहायता कर देते हैं. यह जीवन का मूल भाव अप्रतिम है.


जनवरी का महिना….खजुराहो में एक चिकित्सा संगोष्ठी में सम्मिलित होने के लिए निकला तो मध्य रात्रि को छतरपुर – खजुराहो के तिराहे पर जाकर अटक गए …. आगे जाने को कोई साधन नहीं और मंजिल अभी भी 20 किलोमीटर दूर. सामने पुलिस थाना, जवान बैठे आग सेंक रहे. बिना सोचे पहुँच गया, परिचय दिया …. उनके वरिष्ठ ने कहा…..अब तो कोई गाडी मिलेगी नहीं आपको, रात आप थाने में कुर्सी पर बैठ सकते हैं….ऐसा लगा जैसे थाने में भी संस्कार का उच्च भाव उतर आया हो.

अलाव के सामने बैठ आग ताप कर ठिठुरते रहे कि सड़क के तिराहे से खजूराहो के रास्ते को 2 अति आरामदायक वातानुकूलित टूरिस्ट बसे मुड़ी…… कि एक जवान बिना बोले दौड़ पडा..रोक ली बस.
कहा..हमारे साहब को खजुराहो छोड़ देना..
सहमत.
मैं कृतज्ञ…अनुग्रहित.

धन्यवाद ही कह पाया …मैं… लेकिन जीवन के मूल्यों के प्रति मेरी आस्था और प्रगाढ़ हो गयी.
ऐसा नहीं है कि शहर इस भाव से अछूते हों, “परहित सरस सुख नहीं” का भाव यदा कदा दिख जाता है.

सोमवार हाट था. एक शाम कार खड़ी कर मैं कार्य संपन्न कर लौटा ….. तो कार चालू न हुई. लगा जैसे बैटरी अपनी उर्जा खो बैठी है. संशय में कि क्या करूँ, इधर उधर देखा . बुलेट मोटर साइकिल पर एक तगड़े सरदार जी बैठे थे. मैंने निवेदन किया कि प्राजी, थोड़ी मदद कीजिये.
…आहो प्राजी, चलो अभी जोर का धक्का दे देते हैं, और एक धक्के में गाडी चालू. कार से उतर कर सरदार जी को गले लगा धन्यवाद दिया, वे बोले……..आहो प्राजी, कोई गल नी, कभी भी ले लो सेवा, वाहे गुरु की सेवा है.

…मन द्रवित हो गया तभी, संस्कारों को नमन किया की ऐसे लोग बिना सोचे तुरंत मदद को आगे आ जाते हैं.


बेटी आकांक्षा को हॉस्टल खेल मैदान में सोने की हीरा जड़ी अंगूठी मिल गयी. एक दिन पहले ही आमदाबाद के विभिन्न कालेजों की खेल प्रतियोगिता थी. बिटिया ने अपने साथियों को कहा, किसी का कुछ खोया हो, सुचना आये तो मुझे बताना , मुझे कुछ मिला है.

15 दिन बाद एक लड़की, अपने मित्र के साथ दौड़ती हुई आई, दीदी आपको कुछ मिला है फेस्ट के दिन. मैं बताऊँ क्या है. जांच के बाद बेटी ने अंगूठी सौंप दी, गले लग रो पड़ी लड़की.

बिटिया बोली बाद में मेरे से कि, पापा ऐसी भावना जीवन में कभी महसूस ही नहीं हुई थी. नए कपडे, अपना जन्मदिन, उत्सव का उत्साह,मित्रों के साथ मौज मजामस्ती सब उस भाव के आगे फीके थे……. मैंने किया ये …..का अद्भुत भाव अनुपम है.
मेरा भी मन गदगद हो गया, संस्कार स्थापित हो गए. साधुभाव का पालन पोषण जटिल है किन्तु एक बार यह भाव आ जाये तो आत्म संतोष , पूर्ण आत्म – पूर्ति का रस …कुसुमित हो जाता है.


नाशिक पावन तीर्थ के गोदावरी नदी के तीरे निजी रिसोर्ट क्षेत्र में सुबह सुबह 2 दोस्त घूमने गए, नदी दर्शन और सूर्योदय दर्शन को. कैमरा निकाला हाफ पेंट से और नदी, नाव, सूर्य देव के फोटो खींचते खींचते लौट आये. लौटकर ऐसा लगा की पर्स से अलग रखे पैसे कुछ कम हैं, सोचा कल कहीं इसी 10 लोगों की टीम को खाने पीने के लिए दिए होंगे कहीं. मन समझा लिया और रिसोर्ट के पानी के छोटे तालाब में नहाने उतर गए. मन बैचेन की पैसे कहाँ गए…मित्र बोले एकदम से चुप क्यों हो गए. . . कुछ नहीं बोला.

4 दोस्तों की टीम सुबह हमसे अलग नदी की और नाव यात्रा पर चली गयी थी वो लौटे और उनमें से एक सुशील बोले, किसी का कुछ खोया है क्या, मैं बोल दिया हाँ, कुछ पैसे मिले क्या. संजय और सुशील बोल उठे ये 10000 मिले हैं 2000 के 5 नोट, नाव के नीचे पड़े थे …एसा लगा जैसे देव मिल गए, अरे, बड़ा चमत्कार हो गया ये तो, फोटो खींचने के लिए मोबाइल निकालते समय हाफ पेंट में रखे नोट धीरे से निकल गए और मनोहारी द्रश्यो को कैद करने के लोभ में जेब में हाथ डाला ही नहीं और पैसे अलोपीदीन हो गए….और कैसे देखिये फिर प्रगट भी हो गए की मित्र वहीँ पहुंचे जहाँ पैसे गिरे थे. सूने में भी जीवन पैदा हो गया…

कृतज्ञता का भाव अनुपम है सदैव उपस्थित होता है, उगते भास्कर को देख, लहलहाते फसल और झूमते पेड़ों को देख, सरसराती वायु को महसूस कर और पैरों तले बिछी पार्थिव पृथ्वी माँ पर स्वयं को चलते देख.

मानो तो कृतज्ञ,

न मानो तो पंचतत्व और नौ रस ने अपना कर्तव्य तो निभा ही दिया

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