Stairs(Blog-354)

उम्र यूँ सीढ़ीनुमा चाल से चढ़ती जाती है ….
दिन कम हो या नम, एहसास निरंतर कराती है …

मंजिल पर पहुंचना ही होगा तू चला चल ….
जीवन का यह पाठ निरंतर पढ़ाती जाती है ….

जो सीढ़ी जाती ऊपर हैं, नीचे आना भी क्रम है….
जो समझ ले यह मोह माया, यह पराक्रम है

जब तक तू नहीं समझेगा आने जाने का मेला ….
सीढ़ियां रहेंगी कायम जीवन का यह रंग अलबेला.

कोई पीड़ित धन लालसा से, कोई यश को भागे है
मान ना मान सीढ़ी का रंग तो सबको लागे हैं .

तू चला चल हो जागृत या ना हो यह क्या सोचेगा ….
लिखा है जो तकदीर में क्या अलग उससे होगा.

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