My Pets(Blog-348)

आज के पेट्स …..

(दो नये मित्रों का संवाद)

आपके घर पेट्स हैं क्या?
जी,मतलब?
अरे कोई पालतू जानवर है क्या?
हाँ, हाँ अब तो एक कछुआ मात्र है.
याने पहले और भी पेट्स थे.
हाँ, दो बैल थे.
बैल!
हाँ, ३ भैंसे भी थीं.
भैंस, पेट्स …कैसे!
और ४ गायें भी थीं…और हाँ एक देशी कुत्ता भी..और एक घोड़ी भी.
अरे ! सोचा न था.
हाँ जी हर किसान के घर में ये संपत्ति होती थी.
तो आप गरीब थे !
हाँ, यदि घर में १० बड़े जानवर पालकर मैं गरीब सिद्ध होता हूँ तो मैं गरीब था. अब एक कछुआ मात्र पालकर भी मैं अमीर होता हूँ तो मैं अब अमीर हूँ.
…..बातचीत को अनचाहा विराम लग गया, तो नए दोस्तों के बीच.

गाँव में, मैं आधे एकड के मकान में जिसमे सायबान, दालान, आँगन, कुआँ, कोठार , मिटटी की दीवारों के हालनुमा कई कमरे थे , पशु बंधने की अलग जगह….और तो और कब्बडी का मैच खेल लो इतनी जगह तो बिना उपयोग के खाली पड़ी थी, तीन नीम के, एक आम, एक पीपल और एक जामुन का पेड़ लगा थे घर में…….. तो उस कोठी नुमा घर में मैं गरीब था.


आज पंद्रह सौ स्क्वयेर फीट के प्लाट में दो मंजिला मकान है जिसमें कोई आँगन नहीं है, बस कमरे ही कमरे है और शहर में कोई खेती या रहवास या व्यवसाय योग्य, पशु पालन योग्य जमीन नहीं है तो यहाँ मैं अमीर हूँ. वहां गाँव में ४२ एकड़ की खेती की जमीन थी,जिसमे हम गेहूं, सरसों, तुवर दाल, ज्वर बाजरा की खेती करते थे और अनाज मंडी में हर साल फसल बेच कर अपना, पशुओं का और देश का पेट भरा करते थे. राजा थे गाँव में और अब आप साहब की तरह शहर में रहते है, रंन्क की भांति. कैश क्रॉप याने नगद की खेती ने खेत लील लिए, नयी टेक्नोलॉजी, नए ओजार, संकर पैदावार जिसे आप जेनेटिकली मॉडिफाइड या जी एम खेती कहते हो…ने पैदावार बढाई, खेत खूब लहलहाए , पैसे भी खूब आये, लेकिन संस्कार और संस्कृति ने दो तत्वों के सामने दम तोड़ दिया…वो है पेट्रोल और शराब…


नयी संतति ने याद सँभालते ही भरपूर अन्न, धन, सुख-सम्पदा घर में देखी. गाड़ी, टी वी , बिजली देखी. माँ- पिता और दादा –दादी से भरा पूरा परिवार देखा परन्तु उनका पसीना नहीं देखा और ट्रेक्टर पर सवारी कर कार का सपना पूरा किया वो भी वातानुकूलित. पसीना बहने न पाया कैश क्रॉप में जो कैश घर आया प्रचुर मात्र में तो पेट्रोल ने नयी पीढ़ी को शराब की दुकानों तक पहुंचा दिया.बच्चे पढ़े, आगे बढे पर खेत की और न मुड़े, शहर को चढ़े और गाँव छोड़ चले.

…और तो और अब ये नयी संतति न तो ब्याह करने को तैयार है न ही अपने खुद के पेट्स पैदा करने को…यानि अपने बच्चे भी नहीं करना चाहते कि…. और कारण कैसे थोथे,

मेरा तो केरिएर थम जायेगा मेरी तरक्की रुक जाएगी ….आश्चर्य होता है समाज को किस दिशा और दशा में ले आये हम……और तो और बुढ़ाते माता पिता को सँभालने में…इस आत्म-केन्द्रित और न्यूक्लियर परिवार के चलते सेवा भाव की अभिनव रूचि का जड़ से हास होने लग पडा है.

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