Peepal Tree (346)

तोता रटंत ही है….


पीपल की वर्तनी बताइए
…..पी ई ओ पी एल ई…
वह तो people है, अंग्रेजी का शब्द. उसकी स्पेल्लिंग है. मेरा शब्द गौर से सुनिए.
पीपल की वर्तनी बताइए !
……ये वर्तनी क्या होता है?
जिसे आप अंग्रेजी में स्पेल्लिंग बोलते है उसे ही हिंदी में वर्तनी बोलते हैं.
……ओके. पीपल की वर्तनी है, प उसमें बड़ी ‘ई’ की मात्र फिर ‘प’, फिर ‘ल’ ….
अच्छा तो आप जानते हैं दोनों पीपल!
……एक है हिंदी का पीपल वृक्ष और दूसरा अंग्रेजी का पीपल अर्थात जन याने लोक समुदाय.
पता है आपको, इनमें से कौन सा पीपल पवित्र है ?
……दोनों ही पवित्र हैं. दोनों प्रकृति या यूं कहें इश्वर की रचना हैं.
जब दोनों पीपल पवित्र हैं, तो एक पीपल क्यों बच नहीं पा रहा है और एक पीपल क्यों बढ़ता जा रहा है ?
……अरे एक पीपल ने दूसरे पीपल को परेशान कर रखा है और दूसरा पीपल चुपचाप एक स्थान पर खड़ा होकर दो पैर के पीपल को भुगत रहा है.


मित्रों का संवाद गंभीर होता जा रहा है.
तो यह समझना मुश्किल है की पीपल ने पीपल को क्या कर रखा है लेकिन विकट स्थिति जरूर है….इस धरा पर जो पीपल है और इस धरा का जो पीपल है यह दोनों में एक प्रासंगिक अनथक संघर्ष चल पड़ा है ….धरा का पीपल जो है वह सेवा भाव में है और दो पैर का जो पीपल है वह प्रथ्वी और नैसर्गिक सम्पदा के अंधाधुंध दोहन के मार्ग पर आंख बंद कर दौड़ रहा है ….वह यह नहीं जानता कि धरा का पीपल अगर ना रहा तो यह दो पांव का पीपल भी ना रहेगा यदि पर्यावरण को हमने एक मत हो नहीं बचाया तो.
लगता है, तोता रटंत ही है.
क्या मतलब?
मतलब यह है की सभी सुधिजन या आम जन तोते की भांति अरण्य राग में लिप्त हैं. बहेलिया आयेगा, जाल फैलाएगा, उसमें फंसना नहीं है. ….और बहेलिया आया और सारे के सारे तोते फंस गए उसके जाल में.
कैसे…
ऐसे, कि तोता रटंत ही किया परन्तु क्रिया नहीं की अर्थात सिर्फ हम रट रहे है…पर्यावरण ख़राब हो रहा है, प्राकृतिक संसाधन समाप्त हो रहे है खाद के अन्धादुन्ध उपयोग से धरा की उर्वर शक्ति क्षीण हो रही है फिर भी कोई जाग नहीं रहा.

हम सब को ज्ञान है तो अनुशासन कोई पालन करता नहीं. ओजोन की परत की जैसी बड़ी बड़ी बातें अंतर्राष्ट्रीयसंगोष्ठी में पूर्णतः वातानुकूलित विशालकाय कक्षों में की जाती है, कितना कार्बन दी ऑक्साइड का उत्सर्जन होताहै किसी को परवाह नहीं है. पर्यावरण सुरक्षा का ज्ञान बांटने के लिए हजारों तन कागज़ नष्ट किया जाता है जो जंगल को काट कर ही पैदा होताहै. ज्ञानी जन भी रटंत विद्या ही ग्रहण कर रहे है. कोई मध्य मार्ग नहीं है.
….अरे आप तो बहुत फिलोसोफिकल हो गए. रास्ता बताएं!
रास्ता तो अगली पीढ़ी को अभी से जाग्रत करने का ही है ताकि, बीती ताहि बिसर देहि… आगे की सुधि लेई.
अब अनिवार्य है कि कचरा निस्तारण, कार्बन क्रेडिट, ग्रीन हाउस इफ़ेक्ट पर स्कूली छात्र’ के साथ साथ किसान को भी प्रशिक्षित किया जाये. जब घर घर फोन हो सकता है, इन्टरनेट से हर हाथ में स्मार्ट फोन हो सकता है तो शिक्षा की एक नयी कक्षा भी हो सकती है.


क्या आप मुझे पहचानते है ?
नहीं

चलिये मैं ही बताता हूँ… मुझे पीपल कहते हैं. इस मकान की पहली मंजिल की खिड़की के पास दिवाल में उग रहा हूँ .मेरी उम्र 3 वर्ष है.
अपने बारे में बताऊँ.
पीपल का वृक्ष हूँ मैं. संस्कृत भाषा में मुझे अश्वत्थ वृक्ष कहते है. सभी पुरातन पुराण एवं समस्त समाज मुझे देव वृक्ष कहता है किन्तु मुझे सबसे ज्यादा प्रसन्नता तब हुई जब युद्ध स्थल पर भगवान् कृष्ण ने गीता के दशम अध्याय विभूति योग में यह कहा कि वृक्षों में मैं स्वयं कृष्ण पीपल हूँ ।आज आपको बताना चाहता हूँ क्यों भगवान कृष्ण ने मुझे स्वयं के रूप में साक्षात कहा।ध्यान से सुनिये, न तो मेरी लकड़ी पवित्र हवन में हवि के रूप में उपयोग होता है, न समाज जलाऊ या सामान बनाने में मेरा उपयोग करता है, न तो मेरे वृक्ष रूप में कोई फल लगते हों जिसे खाया जा सके जब मुझमे कुछ है ही नहीं तो भी भगवान् कृष्ण यह क्यों कहते हैं मैं वृक्षों में पीपल हूँ.
शायद भगवान् कृष्ण ही मुझे पहचान पाये. मैं संघर्षों को गले लगाता हूं. चुनोतियों का सामना करता हूँ .मुझे न जमीन की फिक्र न पानी की चिन्ता जहाँ मेरा बीज गिरा मैं वहां खड़ा हो जाता हूँ. मेरी जिजीविषा अद्भुत है मैं हर परिस्थिति में स्वयं को सिद्ध करने का प्रयास करता हूँ. मेरे जीवन का रास्ता सदैव संघर्षों का रास्ता रहा. भगवान कृष्ण ने स्वर्ण द्वारिका का जब समुद्र की छाती पर निर्माण किया तब उन्होंने मेरा ही विचार किया था. हाँ एक और बात वृक्षों मे मैं ही मात्र ऐसा वृक्ष हूँ जो दिन और रात दोनों समय ऑक्सिजन प्रदान करता है.
इसीलिए भगवान कृष्ण ने गीता में यह कहा मैं वृक्षों में पीपल हूँ . जीवों में उन्नत प्रजाति है वृक्ष की जो मानव से भी श्रेष्ठ है क्यों और कैसे कहने से पहले थोडा सा सोचोगे तो उत्तर पा जाओगे….परागण के द्वारा हमारे बीज का निर्माण हो जाता है. मिटटी में उलटे पड़े हो या सीधे , थोड़ी नमी हो बस तो हमारा उदय प्रस्फुटित हो जाता है. भोजन के लिए जीवों की भांति हमें दौड़ना और उड़ना नहीं पड़ता है क्योंकि हमारा भोजन हम खुद पैदा कर लेते है और बिना स्वार्थ देने का स्वभाव पढ़े हैं हम….सम भाव से धरा से एकसार हो बिना एक स्थान से हिले परोपकार में धरा, सूर्य, जल, हवा के संग रासायनिक क्रिया कर सेवा भवव से प्राणवायु के साथ साथ प्रथ्वी को ठंडा रखने का भी द्रविड़ कार्य संपन्न करते है ..बताओ मुझे है कोई एसा जीव जीवन्टर जो इस निस्वार्थ भाव से सेवाभावी हो…

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