Panchendriya

आज कवि मन जाग्रत हुआ तो कुछ इस प्रकार से पंचेन्द्रिय के रूप में….

पंच इंद्रिय के सुख…

सुख भांति भांति के,
कर्म से उकेरे जाएं,
सुख की राह ऐसी,
सब सरपट दौड़ें जाए.


जीभ पर गुड़ रखो,
मन गुड़ गुड़ हो जाए.
जीभ को मीठा लगे,
रस, हृदय को भाये.


शब्द जीभ पर आसीन,
बोल तो मीठे बोल.
कड़वे जो वचन कहे,
तो सुख तजे बिन मोल.


संगीत की स्वर लहरी,
कानों में गूंजती जाए.
ताल मधुर गान अद्भुत,
मन हो तो मन हर्षाये.


त्वचा का सुख रेशम,
प्रेमी मिल मिल जाएं.
जो सुख स्पर्श का पाये,
मन भी मलमल हो जाए.


नैन देखें झील पहाड़,
वृक्ष जंगल और फूल.
सुंदर देखी सुख मन आये
रूप जीवन का मूल.


सुगंध ऐसी नाक में समाए,
मन इत्र पुष्प गंधाये.
भोजन भी महके तो,
रोम रोम पुलकित होये.


परमानंद को लाता यौवन,
पाए संतान रूपी सुख.
लीला प्रकृति की ऐसी,
जन्म मृत्यु काल दुख.


भाग्य के सुख अनुपम अलिखित,
हस्तरेखा में उकेरा जाये.
अलौकिक पुण्य कर्म हों ऐसे,
रुपये में तीन अठन्नी हो जाए.


सत्ता का सुख भी मोहिल,
मुखिया बनने को ललचाये.
राजा बनूं यत्र-तत्र इतराऊँ,
हर्षित मन ऐसा होता जाए.


कर्म फल पा मन सुखयाये,
रक्त स्वेद यूँ महकाए.
कर्तव्य पथ के सब हामी,
मेहनत कर मन महकाएँ.


यश को आसक्त सदा,
नाम करने को आतुर.
राग कौन सा छेड़े,
जाने किंचित चतुर.


मौन का सुख श्रवण जाने,
श्रवण से ध्यान उतराए.
श्रृंगार करें मौन श्रवण का,
भवसागर को पा जाएं.


सुख इंद्रियों के तन भरमाए,
अन्तः करण से चित्त अहंकार,
सुख दुख का लोभ ऐसा,
मन बुद्धि को दे ललकार.

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