तिलक आलोकित है नद चम्बल पर,
आदित्य का श्रृंगार है जैसे चरम पर.
पीताम्बर जैसे सिक्के यूं झिलमिलाते
क्षण भर को दृश्य, दृष्टा को दिखलाते.
पंचतत्व से जीवंत हुई धरा अनमोल है
प्रकृति ही अलौकिक, और शक्ति कौन है.
बिखरा पड़ा सुंदर संसार है, संभालना है
दौड़ अपनी प्रभु मिलान को, याद रखना है.

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