Kajli Garh

कल शनिवार की रात 10:30 बजे मेरी बैचमेट विधात्री का फोन आया कि चलो कल कजलीगढ़ चलते हैं, कुछ पक्षी देखेंगे कुछ प्रकृति का मनोरम दृश्य देखेंगे और सूर्योदय भी…

न जाने कैसे हिम्मत जुटाकर सुबह 5:00 बजे उठकर 6:30 बजे खंडवा रोड पर सिमरोल से पहले बाएं हाथ पर 4 किलोमीटर अंदर सड़क से कजलीगढ़ किले पर पहुंच गए….. शांत, निर्मल, नीरव धवल उगते सूरज के पहले दर्शन…. हरे पत्तियों से लदे पेड़ और जहां तक दृष्टि जाए हरा और भरा जंगल, घाटी के दोनों ओर… और बहती हुई शुद्धतम प्राणवायु को आत्मसात करते हुए धन्य हुए

… चिड़ियों की आवाज को मस्तिष्क में रिकॉर्ड करते हुए सपरिवार बैठक लगाई और करीब करीब 60 मिनट हम यहां वहां घूमते रहे…. प्रकृति के निर्मल आगोश में भ्रमण करते रहे, प्रकृति से रोमांस करते रहे…
भवसागर के रंगीन भंवर में उतराते रहे ….उठने और वापस आने का मन नहीं था लेकिन समय और बंधन में बंधे …

हम सब योगी, मानव रूपी अवतार की ओर वापस लौट चले…

लौटते समय वही 1 किलोमीटर पर एक गहरी खाई पर महादेव मंदिर का है, गाड़ी से वहां तक पहुंच गए… करीब करीब सौ सीढ़ी नीचे उतर कर गए तो वट वृक्ष की जड़ों का ऐसा जाल उपस्थित था कि समझ ना आए और उसी जड़ों के नीचे नंदीदेव सदैव की तरफ प्रतीक्षारत दिखे…शिव की प्रतीक्षा में बैठे हुए मिले …लेकिन वहां कोई महादेव के प्रतीक शिवलिंग अथवा मूर्ति कुछ भी नहीं ….जैसे निराकार से वहां उपस्थित हो.

गर्मी का मौसम होने से पानी नहीं था लेकिन ऐसा प्रतीत हुआ कि ऊपर से पानी आता होगा और इस मंदिर को बिल्कुल सदैव सराबोर रखता होगा ….एक साकार भावना संभवत ईश्वर की ओर प्रथम कदम होता है जबकि निराकार भाव से ईश्वर आपको एक दूसरी कदम पर चढ़ा लेते हैं और जब साक्षात्कार हो तो वह अंतिम पड़ाव होता है अंतिम सीढ़ी होती है ….माहौल कुछ इतना पावन था वहां इस छोटे से जगह पर की सुधि जनों के लिए यह समाधि के लगने जैसा स्थान हो सकता है…. जहां वह मायालोक में रहकर भी भीतर की यात्रा संपन्न कर सकते हैं …

सुबह के 3 घंटे में यह पूरी यात्रा समाप्त हो जाती है…

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