मूवी रिव्यू: मस्का
भावनाओं के असीम समंदर में अपने सपनों की छोटी कश्ती के द्वारा समंदर पार करना कठिन कार्य है और जब कश्ती में छेद हो और निगाहें आसमान की ओर हों तो मुद्दा जटिल हो जाता है.
ऐसा अनुभव, मस्का नामक फिल्म में हुआ जहां 1920 से संचालित एक पूर्णत: स्थापित एवं प्रतिष्ठित बेकरी के संचालकों की नवीनतम संतति अपने चकाचौंध भरे नवीन सपनों को पूर्ण करने के लिए बेकरी की प्राइम लोकेशन की दुकान को विक्रय कर मिले पैसे से फिल्म बनाने में लगाना चाहते हैं. पिता के दिवंगत होने और मां के द्वारा व्यवसाय संभालने के बाद भी जगमग सेल्यूलॉइड की दुनिया में अपनी एक्टिंग का परचम लहराने के लिए यह बालक अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार हो जाता है जब उसे 5 करोड रुपए फिल्म बनाने के लिए देना होते हैं और उसके सामने संपत्ति के रूप में 100 साल पुरानी अपनी दुकान बेचने के अलावा कोई रास्ता सूझता नहीं है
माँ नाराज होती है और घटनाक्रम हृदय के ईसीजी के उतार चढ़ाव की भांति ऊपर नीचे होता है परंतु भावनाओं का समंदर महत्वाकांक्षा और चमक दमक की दुनिया की कश्ती को डुबो ही देता है
कथानक संवेदनशील है और फ़िल्म उद्योग की चकाचौंध से नये क़िस्म का प्रदर्शन कराता है जहां सपने बुलबुले की भाँति पनपते और फूटते रहते हैं
देखने योग्य है

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