क्या तुम बेमानी हो …
क्या तुम बेमानी हो,
मृत्युलोक में पुनः चले आये.
लोभ में चंद सिक्कों के,
बिकने फिर चले आये.
क्या तुम निरर्थक हो,
जो मानव फिर बन आये.
वासना के वशीभूत,
परमतत्व को छोड़ आये.
क्या तुम अभिमानी हो,
जो मानमर्दन को आये.
पद सत्ता के लोलुप,
माया पाने को हर्षाये.
क्या तुम लोभी हो,
जो माया माया करते.
जो है परन्तु नहीं है,
इसको भी नहीं समझते.
क्या तुम झूठे हो,
जो सच को यहाँ तलाशते.
सच कहंने का मौका आये,
तो सच कभी न कह पाते.
क्या तुम अहंकारी हो,
दूसरों को छोटा समझते.
अपने बडेपन को छुपाते,
अहं को तुष्ट करते चलते.
क्या तुम प्रतियोगी हो,
दुसरे को सदा हराते.
कैसे भी जीतूँ की चाह में,
एनकेन तुम सदा हारते.
क्या तुम घृणापात्र हो,
जो घृणा बांटते फिरते.
जो बोओगे वही पाओगे,
ये सिद्धांत तुम बिसराते

सुखदु:खेच्छाप्रयत्नज्ञानानि आत्मनो लिंगम् ||
न्यायदर्शनम् १,१,१०.
सुख दु:ख इच्छाद्वेष प्रयत्न और इससे प्राप्त ज्ञान ही तो आत्मा के (लिंग) चिंन्ह हैं. 😊
सुन्दर व सम्यक् आत्मदर्शन का वोध कराती हुयी कविता के लिये प्रभूत साधुवाद 💖
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