प्रतीक्षा:
प्रतीक्षा एक स्थिति है जो प्रति क्षण के आने की और घटित होने की संभावना को आतुर है.
प्रतीक्षा का प्रयोजन, प्रेयसी के प्रति हो या भगवान राम के प्रति वनवास से लौटने की उनके भाई भरत की हो अथवा अनादिकाल से नंदी की प्रतीक्षा अपने आराध्य शिव के प्रति हो, अनमोल ही है.
आर्यावर्त का सनातनी इतिहास इस प्रकार के प्रतीक्षारत उदाहरण से भरा पड़ा है चाहे वह सतयुग में राम की प्रतीक्षा में शबरी की पथराई हुई दृष्टि से मार्ग को तकती हुई आंखें हों या द्वापर युग में मथुरा के कंस के आतंक के अंत की प्रतीक्षा की वासुदेव और उनकी पत्नी देवकी के कंस के नाश हेतु कृष्ण की प्रतीक्षा में हो.
राम के काल में एक श्राप के चलते पाषाण हुई अहिल्या देवी के प्रतीक्षारत हो राम की बाट जोहने की कथा भी प्रतीक्षा के महत्व को प्रदर्शित करती है. अनादिकाल से प्रचलित कथाओं में सही समय के उपस्थित होने पर किसी कार्य विशेष के पूर्ण होने के अनेक अनेक उदाहरण मिलते हैं जिसमें भागीरथ के प्रयासों से मां गंगा के पृथ्वी पर आने का प्रसंग प्रतीक्षा की एक अद्भुत कथा को प्रस्तुत करता है जिसमें गंगा स्वर्ग लोक से आने को आतुर हैं परंतु कहीं अवचेतन मन में यह भाव उपस्थित है कि मेरे इतने वेग को पृथ्वी कैसे सहन कर पाएगी और तब सदियों से प्रतीक्षारत भगवान शिव, आई हुई गंगा को अपनी जटाओं में समेट लेते हैं और पृथ्वी पर जीवन का सृजन होता है.
नंदी के प्रतीक्षा का प्रसंग अकल्पनीय है जो अनादि काल से अनंत तक नंदी के द्वारा गर्भ ग्रह के बाहर प्रस्तुत किया गया है जो भगवान शिव के लिंग स्वरूप की अभिनव प्रतीक्षा में न केवल लीन है बल्कि सदा से प्रतीक्षा में है. भारत के मंदिरों में शिवलिंग जहां-जहां स्थापित है नंदी देव की स्थापना प्रतीक्षा का एक ऐसा प्रतीक है जो मानव मन को उद्वेलित और सोचने करने के लिए पर्याप्त है कि
हे नदी देव प्रभु आप कब से भगवान शिव के गर्भ ग्रह से बाहर आने की प्रतीक्षा में हो.
प्रतीक्षा का नंदी देव का यह भाव अनादि काल से जारी है जो प्रेरणा का स्रोत तो है ही बल्कि धीरज के एक भिन्न स्तर को प्रस्तूत करता है.

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