
थोड़ा थोड़ा….
जोड़ा बहुत कुछ,
कुछ जोड़ा थोड़ा.
जो दिल तोडा तो,
बहुत धन जोड़ा.
चलना जो सीखा तो,
मन लगा के भी दौड़ा.
साकार को समझा तो,
निराकार भी थोड़ा.
पितृ भाव पाला तो,
बचपन भी यादों में रखा.
प्रेम का धन सहेजा तो,
विष भी रखा थोड़ा.
गद्य को पढ़ा-लिखा तो,
पद्य भी किंचित उकेरा.
विज्ञान को साधा तो,
गूढ़ वित्त भी समझा थोड़ा.
अचरज को भरा जीवन में,
धीरज को भी पाला-पोसा.
भले की जो आस करी तो,
कृपा से मिला बुरा भी थोड़ा.
माया की लीला समझी,
जानकर भी भोगा.
करुणा को जाना तो,
हुआ स्वार्थी थोड़ा.
संतोषम परमम् सुखम पढ़ा,
प्रयास कर पालन किया .
सत्यम शिवम् सुन्दरम जाना,
तो उसे भी माना थोड़ा.
देखा दृश्य, दृष्टा होकर तो,
साक्षी होकर भी ठहरा.
दुनिया ठहरी आभासी तो,
मैं वास्तविक रहा थोड़ा.
अहंकार से जीवन भरा तो,
कभी कभी छोड़ना भी सीखा.
चित्त का पित्त उमड़ा खूब,
निवृति को भी सोचा थोड़ा.
न जाने, भाग्य को बहुत कोसा,
कर्म जो मैंने किया दुखी होकर .
समझा नहीं मैं कर्म की राह,
तो भाग्य भी इतराए थोड़ा.
जो तू होवे प्रकृति में एकसार,
जाग्रत होगा अंतर्मन तेरा.
और जो करे भीतर की यात्रा,
तर- बतर होवे थोड़ा मन तेरा.
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