Be Tree

निरे वृक्ष तुम…..

कहने को तो कुछ नहीं,
निरे वृक्ष तुम.
गतिहीन और निश्चल,
और क्रोधहीन.


पानी – मिटटी से जुड़े,
छल पाप से परे.
लेने का सुभाव कम,
देना ही तुम पढ़े.


जीते जी प्राणवायु देते,
मरते ही लकड़ी.
हरियाते जीवन भर,
हो अनमोल दमड़ी.


गरलमना, वायु सोखते,
भले हो दूषित.
वृक्ष तुम, ठंडी रखते धरा,
और जल से पूरित.


फुल फल से आलोकित,
पत्ती तना है दान.
छाँव, ठंडक के दाता,
रहो नयनाभिराम.


रहस्य विज्ञान की अनुकृति,
प्रकृति से सुंदर.
भक्ति से भजन करते,
ये अनमोल धरोहर.


होना कभी मानव तुम,
काटना अपनी ही जडें.
कृतज्ञ न होना कभी तुम,
भले, ख़त्म होना ही पड़े.

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