जैसे आज आखिरी दिन हो….
मानव उद्घोष करते जैसे मिटटी का दिया,
अँधेरे से भी किला लडाता अकेला.
घोर घटाटोप अंधेरे से समर-रत ऐसे,
आज आखिरी दिन हो जैसे.
आसक्ति मोह की, लालसा धन की,
प्रवृत्ति बैर की और निवृत्ति नहीं.
भेद-क्रोध पकडे विवेक-वैराग्य छोड़े,
जैसे अमरत्व का घृत पिए हों.
यात्रा का आनंद यात्रा में मंजिल में नहीं,
भले तुम स्वादु बनो या साधू रहो,
रूह का रिश्ता कायम कर ले जो तू,
आज आखिरी दिन हो जैसे.
बदला लेना है कि क्षमा करना है,
या मन मलिन हो ऐसा काम करना है.
दिल मिले का मेला करना है,
श्रम ये चाहे जितना जटिल हो.
चलाचल जीवन कोटि पुष्प है,
नहीं, मन आपदा करना है.
सूर्य पल्लवित हो कुछ कर एसा,
आज आखिरी दिन हो जैसे.
दान करते रहो, भला कर रहो,
हंसा के रहो मुस्कुरा के चलो.
करुणा का सागर दो ऐसे लहरा,
आज आखिरी दिन हो जैसे.
भोग की हो या चित्त योग की,
कब जानोगे सब सपना है.
न भोगना है न भागना है,
भवसागर पार जाना, नाव बिना है.
इश्वर कहीं नहीं, मात्र संवेदना,
श्रध्दा को तज, जिज्ञासा को पूजो.
अनुकरण नहीं आत्म खोज साधो,
आज आखिरी दिन हो जैसे.
तथ्य ही सत्य है, विपरीत न जाओ,
जो सोचो दुर्बल तो राजी हो जाओ.
समय की नदी में बहते यूं जाना,
तैरो जैसे डूबे, जो डूबे तो उतराए..
कर्पुर की भांति समय उड़ता है,
भले समेटो समय मुट्ठी में.
जागो तो जागो भले आँखें बंद खुली,
आज आखिरी दिन हो जैसे.



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