बाकी सब मिथ्या है…..
मृत्यु का कारण जन्म है,
ये माया का अहंकारी लोक है.
कई तो पीड़ित, कुछ ही आनंदित,
अवतार ये मानव का अमोघ है . 1
नभ से उतरती लीला,
रसभरी धरा सुंदर सत्य,
रक्षण करो हर क्षण का,
भूले तुम कि सब मिथ्या है. 2
दौड़ एक तरफ़ा, मोह की माया,
कोई समझा कोई विष्मृत.
जन्म व्यर्थ न जाये ये,
सोता रहे या जागेगा कभी. 3
क्षणिक मोह का समाज,
धन-सत्ता का लोभ.
एकत्र करते बीता हर क्षण,
भूले तुम कि सब मिथ्या है. 4
ये उठा, वो पटक,
ये जमा वो खर्च,
ठगने को आतुर,
छोड़ने को राजी नहीं. 5
शोषण को उत्सुक,
शोषित हो तो ही पाप.
ग्लानि को तज बैठे,
भूले तुम कि पश्चाताप तो मिथ्या है. 6
अर्थ का भंवरजाल,
जानकर फंसते सब.
खुद को भरमाते जब,
द्वेतवाद को पूजते. 7
यात्रा जटिल, मजिल तय है,
भूत भविष्य का लेप लगा है.
जो भी है यही इक पल है,
मान ले, बाकि सब मिथ्या है. 8
सरल होना असाधारण था,
और मानव होना अतिमानव
सतगुण से परे हो संस्कृति भूले
तुमसे कई जीव पौधे लुप्त हुए. 9
जिद तुम्हारी आज भी कायम है,
जैसे तुम, माया के सृजक हो.
अहंकार से विज्ञान को गुलाम बना,
भूले तुम कि सब मिथ्या है. 10

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