लाटरी लग गयी….
भास्कर देव उपर चढ़ आये, तो आँखे मलते मैंने आँख खोली, हे प्रभु, फिर नया दिन, मर मर के जीना पड़ेगा, अधम है जीवन….कहते मैंने रिमोट से ए सी बंद किया और हवाई चप्पल तलाशते नित्यकर्म को अग्रसर हो गया. स्नानग्रह में भी विचार शुन्य न हो पाया की वित्त पोषण कैसे करूँ, बाजार से ऋण लूँ या बैंक में घर गिरवी रखूं या कुछ नहीं तो लाटरी के टिकिट ही खरीद लूँ, कभी भाग्योदय हो गया तो बिना तनाव जीवन सुखमय हो जाये, सोचते सोचते कब तैयार हो गया पता ही न चला.
कार चलाते चलाते चौराहे चौराहे लाटरी टिकट विक्रेता आते रहे, गुहार लगते रहे, मन में, करता के विचार फिर ना करता के विचार आपस में कबड्डी खेलते रहे. उहापोह में कम्पनी पहुँच गए. जैसे मन से पहुंचा, वैसा ही हवा पानी पाया ऑफिस में, सब शिथिल, बुझा बुझा, बिना प्रकाश की मद्धिम रौशनी और मलिन माहौल . दिन समाप्त और लौटने की दौड़, फिर वही लाटरी के टिकट, रंग बिरंगे , कागज़ के नोट की भांति, नेत्र पटल के सामने लहराते, ललचाते और भरमाते, इस शनिवार दस लाख का बम्पर ड्रा और महीने की ३० तारीख को एक करोड़ का जैकपोट की पुकार लगाते. एक तरफ़ा संवाद और लालच की लहरों का सैलाब, उहा पोह का ज्वर भाता, लूँ टिकट या की न लूँ, इस टिकट भाव का आरोह अवरोह.
माँकी शिक्षा बचपन से आँखों के समक्ष तैरती, बीटा ऋण न लेना, बीटा जुआ न खेलना, बेटा बुरी सांगत न करना, बेटा लाटरी का टिकट न लेना, बेटा थोडा में सब्र करना, भड़भड़ा के दीवार में सिर न मार लेना.
…..वाहन तैरते रहे, स्ट्रीट सैलोर्स, प्लास्टिक की बोतल की भांति आतेराहे जाते रहे, घर आ गया. रात नींद न आई, एक करोड की लाटरी के पुरस्कार के पोस्टर बैनर लहराते रहे. भोर हो गयी और नहाकर मंदिर में फिल्म दीवार के अमिताभ बच्चन की भांति खडा हो गया….सोचा क्या बोलूं, मैं तो मूर्ति पूजक हूँ नहीं फिर भी बोल दिया, प्रभु जी आअज तो खुश होगे बहुत तुम, जो व्यक्ति तुम्हारे दर पर एक बार हाथ जोड़ने नहीं आया, घर में मंदिर होने के बाद भी, वह आज घुटने टेके बैठा है.
…..हे भगवन,आज लाटरी का टिकट ऐसा खरीदवा दे की जैकपाट लग जाये….कोई देख न ले की घर का मालिक आज मंदिर में भिखारी बनके खड़ा है, तुरंत बाहर हो गया. शाम को चमचमाता एलक हजार रुपए का ७७७ के अंक वाला लाटरी टिकट मेरे हाथ में था. सीधे मंदिर गया, भगवन को समर्पित किया, गुहार लगा दे….भगवन कभी माँगा नहीं आपसे, आज बल्ली कृपा की लगा ही देना.
….दिल धडकते रहता है, पता नहीं चलता है अब एक करोड़ मिलने की आस में धडाधड ब्लड प्रेशर बढ़ाये जाये है. …एक हजार के खेल में करोड़ का खेला है, इसलिए भगवन को भी साथ में रिश्वत सहित धकेला है….के विचार भी उत्पन्न होते रहे.
….लोभ, इर्ष्य, वासना का ज्वर बुद्धिमान और संस्कारवान को भी बुद्धि के सही और सामान्य प्रयोग से विमुख कर देता है. शनिवार आया और गया …इस बार शुभ दिन को ९ के अंक वाला टिकट ले लिया परन्तु फल निष्फल.
…एक सुबह मंदिर के सामने ही माँ मिल गयीं, क्यों रे, तेरी तो लाटरी लगी है?
क्या क्या, माँ क्या बोली..
…हाँ, लाटरी तो खुली हुई है तेरी.
जल्दी बता माँ, क्या हुआ, मैं बैचेन हुआ जा रहा हूँ.
…अच्छा बताती हूँ, पहले ये बता की, समस्या क्या है तेरी?
माँ, धंधे में कमी, घटे पर घटा, रुका पैसा, बढ़ता खर्च, आमद कम होने से वित्त संकट है.
…तो मार्केटिंग बाधा! अब क्या व्यवसाय के गुर मुझसे सीखेगा, तेरे पिता इतना बड़ा काम छोड़कर गए, उसमें मेहनत कर.
करता हूँ माँ मेहनत.
…तो झुक. लाभ का प्रतिशत कम कर, क्वालिटी का प्रतिशत बढ़ा, अनावश्यक खर्चा कम कर, मीठा बोल, नए समबन्ध बना, वैल्यू एडिसन कर, पैकिंग अच्छी बना, स्कीम ला, जल्दी पेमेंट करने वाले को डिस्काउंट दे, १०० किलो खरीदने वाले को १०५ किलो दे.
…..अब क्या देख रहा है टुकुर टुकुर. माँ तो अनपढ़ है कैसे जानती है ये सब. पेरा डायम शिफ्ट है ये तो माँ का, यही सोच रहा है.
मैं अवाक्.!
….बेटा व्यवसाय मार्केटिंग से, व्य्ग्यापन से, पहचान के स्तर से स्थापित होता है, लिभावाने आकर्षण और वैल्यू एडिसन से बढ़ता है, क्वालिटी और आफ्टर सेल्स सर्विसेज से बाजार में पैर जमता है और व्यावसायिक सम्बन्ध से लाभ, ब्रांड प्रतिस्पर्धा के स्तर पर स्थापित करता है.
मैं अवाक्, मुंह बाए निःशब्द
…बता, क्या क्या नहीं कर रहा है इनमें से.
मौन!
…तेरी तो लाटरी लगी ही हुई है बेटा, बस तू इजी मनी के भ्रमजाल में उलझ गया है. अच्छा बता, घर है,
है माँ.
…तो लाटरी है.
….परिवार अच्छा है?
है माँ.
….तो लाटरी लगी ही है. भोजन, पानी, बच्चों की पढाई,फोने, बिजली, काम काज है?
है माँ.
…तो लाटरी लगी है! अब बता ये इतनी साडी लाटरी लागु हुई है तो टिकट क्यों खरीदना! इसी जीवनशैली को थोडा सा पोलिश कर, ताम्बे का घड़ा जैसा चमकने लगेगा तेरा धंधा और फिर खरीदना लाटरी का टिकट.!
अरे नहीं माँ, आज मेर नेत्र खुल गए हैं. जो मिला है वो क्या लाटरी भूल गया था, कस्तूरी मृग की भांति भटक गया था. अब आज से ही तनाव कम, मेहनत ज्यादा, खुले मस्तिष्क से धंधे को ही लाटरी बना दूंगा.
मैंने मंदिर में खड़ी माँ के पांव छुए और लाटरी बनाने निकल गया….
पीछे माँ की पोतो से होने वाली बात कान में पड रही थी….

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