…..कभी मैं समझा नहीं…..
खेत खलिहान नयी खाद से रोपे ,
भले भूमि बंजर हो हो जाये
पशु गौधन कोई और पाले,
दूध घी मेरा, कभी मैं समझा नहीं…..१
अच्छी सेहत को खा पी के बिगाड़ लिया,
घर का भोजन भाये नहीं,
फिर दवाई से करो उपचार,
मेहनत होवे नहीं, कभी मैं समझा नहीं….२
सड़क के लाल संकेत पर मैं रुकता नहीं,
तेज गति मेरी अनमोल,
घायल होए तो गुस्सा डॉक्टर पर…
दोषी तुम, ये कभी मैं समझा नहीं….३
परमार्थ करे न कोई, लाभ मुझे सब हों,
ऐसा विचार हो फलीभूत
कर्म का हामी नहीं ,
अपना भाग्य कोसते जाना, कभी समझा नहीं….
बेटे को बहु अच्छी मिले,
बेटी बचाना नहीं, कोई समझे ये दर्प,
बहु को न बेटी समझे…
जैसे वो घर की आया, कभी मैं समझा नहीं….५
अंग्रेजियत पढाये संतान को,
न पाए वह देशीपन और संस्कार,
संतान से उम्मीदे,बुढ़ापे में,
क्या रखेगा सेवाभाव, कभी मैं समझा नहीं …..६
मिले नौकरी सदा सरकारी,
भले आरक्षण से या यूं भ्रष्टता से सही,
जो मिल जाये सरकारी तो
फिर काम करना नहीं, कभी मैं समझा नहीं…..७
चुनाव कोई भी लड़ना नहीं,
राजनीती पर जुगाली मैं करता हूँ,
बेबाक लपर लपर राय मेरी सबको,
कदाचित कभी मैं समझा नहीं…….८
मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे हजारों ,
मिलता कहीं इंसान नहीं
माया की लोभी दुनिया,
जीवन का अर्थ कभी मैं समझा नहीं……९
पैसा धन जमीन के पीछे ,
भूले सभी लोक परलोक ये मानव,
जैसे अमर हो आये हो नर नारी,
मृत्युलोक में, कभी मैं समझा नहीं……१०
त्याग भी एक सपना है,
भोग भी एक सपना है माया का लोक है ,
जो साक्षी भाव में जिया वो जागा,
वीतराग ये कभी मैं समझा नहीं….११
क्या सत्य है और क्या विश्वास
कभी बैठ सोचो तो भरमाओगे,
मां ही सत्य, पिता तो मात्र विश्वास,
ये भी कभी मैं समझा नहीं….१२
जो हो, उसमें राजी हो जाओ,
दुर्बल भी हो तो यह सत्य पहचान लो,
तथ्य से बाहर होने का उपाय नहीं,
कभी मैं समझा नहीं……13
ज्ञान वर्षा का मौसम सालोंसाल से
भवसागर को भरता है
गीला कोई होता नहीं, तनिक भी,
आश्चर्य ये कभी मैं समझा नहीं…….१४
रास्ते में रस और रास भरते तुम चलो,
सजग बनो गंभीर नहीं,
सत्यम शिवम् सुन्दरम का आसान भाव,
कभी मैं समझा नहीं…..१५
माया मोह के जंजाल चितेरे हजार यहाँ,
छल कपट धोखे की दुनिया,
सोचा, मैं मोक्ष के रास्ते पर हूँ,
ये भी कभी मैं समझा नहीं…..16
कोई साकार को तो कोई निराकार
तो कोई साक्षात्कार को हामी ,
चाहो तो धर्मं के बिना भी धार्मिक हो सको,
कभी मैं समझा नहीं……17
यूं तो लम्बा समय हुआ परमपिता के
अपने घर से निकले हुए,
जीवन के मैदान को ही घर मान लिया,
कभी मैं समझा नहीं……१८

बहुत सुंदर रचना
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