खोटे सिक्के भी चलते….
सूरज उगता, चाँद चमकता है,
नियम सदियों से ये पालन करते,
कलियुग है भले इतना घना,
खोटे सिक्के भी चलते.
शुद्धता के हम सब हामी,
नैतिकता फिर भी न सहेजते,
सच्चा हो भले खरा,
खोटे सिक्के भी पुजते.
चौकीदार रखते ईमानदार सदा,
आदत चोरी की कभी न रोकते.
सिद्दांत, निष्ठां की बातें बेमानी,
खोटे सिक्के भी चलते.
देश घनेरा सोने की चिड़िया रटते
पेड़ पहाड़ झरने नदियाँ अनमोल
अपना भारत देश महान,
फिर भी खोटे सिक्के चलते.
मोक्ष की दौड़ दौड़ते साधू विप्र,
माया मोह की जकडन सहेजते
तोता रटंत व्यर्थ रटते,
यहाँ भी न मानो तो खोटे सिक्के चलते.
मंदिर समरस का पाठ पढ़ाते,
धर्म भी यूं प्रतिस्पर्धा कराते
जन्म मृत्यु पर सब अधार्मिक,
महादेव के खोटे सिक्के चलते

वाह बेहतरीन
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