Heritage of Earth

धरा के धरोहर


सूर्य में अहं नहीं,
अनंत और सनातन.
प्रकृति का कर्म करते,
पुराने नहीं महापुरातन.


सूर्य में ताप नहीं,
क्रोध में नहीं तपते.
संत भाव से सदा,
प्रेम का जाप करते.


सूर्य में तमस नहीं,
ज्योति के पुंज.
धरा के धरोहर,
निर्मल निकुंज.


सूर्य में प्यास नहीं,
न जल के अभिलाषी.
जो न हों प्रकट,
तो जीव हो उदासी.


सूर्य में घराना नहीं,
लगते नहीं मानव.
तुच्छता तज चुके,
रहते सदा साधव.


सूर्य में हानि लाभ नहीं,
आत्मा के अनुरागी.
कर्म अकर्म समझे,
विकर्म के सदा त्यागी.


सूर्य में आयु नहीं,
अनादि से अनंत.
लीला दान की,
रहे काल पर्यंत.


सूर्य में आलस्य नहीं,
रहे अटल बारह मास.
सदियों से जल रहे,
देते सबको सांस.


सूर्य में ईश्वर नहीं,
रहे सदा साधना लीन.
घेरे में दौड़ते रहे,
जैसे हो गतिहीन.


सूर्य में आत्मा नहीं,
जीव अनंत बिखराए.
मुक्त हो इनमें मिले,
जैसे जग बिसराए.

2 thoughts on “Heritage of Earth

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  1. मित्र डॉ भदौरिया जी आपकी दार्शनिक कविता पढ़ कर आनंद की अनुभूति हो रही है। आपकी कल्पनाओ की दाद देनी चाहिए। मेरी ओर से अनेकानेक शुभकामनायें स्वीकार कीजिए.।

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  2. Vikram Singh Bhadoriya

    सूर्य आत्मा है , सूर्य जल है, लिये अनन्त प्यास वह
    सूर्य रसिक है आकर्षण है जल का
    जो भेजता जमीं पर.
    शुद्ध कर पर्जन्य का
    वैरी नाइस थाँट्स थैंकू चाचू 😊

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