सरकारी अस्पतालों को समाज से उम्मीद
भारतीय समाज की अर्वाचीन परंपरा रही है सहयोग करने की, फिर भले ही वह शारीरिक हो या आर्थिक ही क्यों ना रहा हो. प्राचीन काल में स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर ओ.पी.डी. स्तर पर ही उपलब्ध रहता था तथा उस काल में युवावस्था में मौतों का प्रतिशत भी अत्यधिक रहा रहता रहा जब साधारण उल्टी-दस्त से ही बच्चे बड़े बूढ़े नर-नारी समय पूर्व ही कालकवलित होते रहे. इसी कारण सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कालजई कुप्रथा प्रचलन में भी रही.
आधुनिक काल में जैसे-जैसे यूरोप में मानव शरीर विज्ञान के प्रति रुचि और ज्ञान में वृद्धि हुई तो अब तक के अनगढ़ उपचार विधा को चिकित्सा शास्त्र का स्तर प्राप्त हुआ. पिछले 100 साल में संक्रामक रोगों के प्रभावी नियंत्रण को नई विकसित औषधियों से प्राप्त किया गया. स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा सेवा राज्य सूची में सम्मिलित किए जाने से यह दोनों क्षेत्र राज्य शासन की दया पर जैसे तैसे जीवित रह पाए हैं. बजट की दुर्बल स्थिति, नगरों का विकास एवं कृषि सुधार, भ्रष्टाचार और वेतनमानों ने राज्य सरकार को सरप्लस बजट की स्थिति में कभी भी आने ही नहीं दिया और नियति का खेल समझ आम नागरिक शासकीय अस्पतालों में काल के ग्रास बनते रहे. निदान के उपकरणों का नितांत अभाव, मानव संसाधन की कमी और उनमें कार्यकुशलता का अभाव शासकीय उपचार प्रतिष्ठानों में प्रदर्शित होता ही रहा और ताबूत में अंतिम कील तो 2020 में कोरोना की महामारी के आक्रमणों ने ठोंक दी है. ऑक्सिजन सिलेंडर की कमी से लेकर एंटीवायरल औषधियों की आवश्यकता की संख्या बढ़ते ही स्वास्थ्य तंत्र प्रशासनिक तंत्र प्रदाय तंत्र तीनों ही विफल हो गए…
मानव संरचना जटिल है और बीमारी की सही पकड़ हेतु नई श्रेणियों के उपकरणों से डायग्नोसिस आसान हुआ है. जब 7 करोड़ की पेट् स्कैन मशीन आएगी तो डायग्नोसिस और उसके बाद इलाज सस्ता कैसे होगा. जब पेटेंटेड रिसर्च औषधि मॉलिक्यूल जिसके अनुसंधान और विकास पर बिलियन डॉलर खर्च किए गए हो तो कैंसर या मधुमेह की नवीन श्रेणी औषधि या वियाग्रा जैसी औषधि सस्ती कैसे मिल सकती है और क्यों मिलना चाहिए ! सरकारें तो शासकीय अस्पतालों से अब कैंसर तक की प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी की कीमोथेरेपी औषधियां निशुल्क उपलब्ध करा रही है. और तो और उच्च रक्तचाप मधुमेह आदि के नए मोनोपोली और पेटेंटेड दवाइयां भी हम नागरिकों को निशुल्क प्राप्त हो, की अपेक्षा और अभिक्षा रखते हैं तो नागरिक ₹10000 के रात भर के होटल में कमरे का भुगतान खुशी से करते हैं तो स्वास्थ्य लाभ में होने वाले खर्च में डॉक्टर या औषधि का महंगा होने का शिकायती भाव कैसे दे सकते हैं कि यह अन्यायपूर्ण है. समाज का विकास कुछ इस प्रकार हुआ है कि सस्ते में काम करने वाली फैमिली फिजिशियन तथा छोटे नर्सिंग होम और कपल नर्सिंग होम आदि समाप्त होते चले गए और कारपोरेट अस्पतालों की संस्कृति पनपती चली गई. मानते हैं कि चिकित्सालय का भी उद्देश्य धन उपार्जन है तो हमारे समाज ने आगे होकर इन कॉरपोरेट्स अस्पतालों से मुकाबला करने के लिए सरकारी अस्पतालों में अपना वित्तीय सहयोग याने दान देकर सीटी स्कैन डिजिटल एक्सरे मशीन या पैथोलॉजी के उपकरणों की स्थापना क्यों नहीं करवाई. वोटों के ध्रुवीकरण हेतु पूरा भारत, समाज में जाति में और रंग में बंट गए हैं किंतु स्वास्थ्य सेवा में चैरिटी बतौर अपनी जेब से दमड़ी भी ढीली नहीं की है. सारा उत्तरदायित्व शासन का भले हो हमारी भी समग्र रूप से यह नैतिक जिम्मेदारी है कि हम इन शासकीय संस्थानों के स्तर को आधुनिक बनाए रखने के लिए उद्यत हो ताकि जब हमें आवश्यकता पड़े तो हमारा कार्य से सिद्ध हो. यही आज कोरोना काल में शासकीय अस्पतालों के जर्जर हालात को देखकर व्यथित हुआ जा सकता है कि हम समग्र रूप से इसके दोषी नहीं है क्या मात्र डॉक्टर समुदाय इसके लिए दोषी है.
क्या हमने अनुसंधान के माध्यम से नए औषधीय ड्रग ट्रायल को एक प्लेटफार्म पर उपलब्ध कराया है?
क्या हमने हमारे जातिगत और विभिन्न समाजों ने अपने समाज के लिए धर्मशाला तो बनाई पर धर्मोपकारी अस्पताल नहीं बनाएं?
छोटे नर्सिंग होम डे केयर सेंटर या प्रशिक्षित छोटे चिकित्सकों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है ताकि महंगे निजी चिकित्सालयों में अनावश्यक उपचार लेने की परिस्थितियों से बचा जा सके. समय विकट है लेकिन विकट समय में
👌आत्मा और लोगों द्वारा नागरिकों को विकसित किए जाने की अनिवार्यता है आवश्यकता है ताकि पूर्व से स्थापित शासकीय परमार्थिक न्यास द्वारा संचालित चिकित्सालयों को अपग्रेड किया जा सके. नए अस्पतालों के स्थापित किए जाने की आवश्यकता नगरों में तो कम से कम नहीं है बल्कि अनिवार्य है कि उपलब्ध संसाधनों को एकत्र कर पूर्व से उपलब्ध चिकित्सा उपचार स्थापना में निवेश करने दैनिक उपकरणों व नए विशेषज्ञ चिकित्सकों को पे – रोल पर यह विजिटिंग कंसल्टेंट स्थापित करना ही होंगे.
अब एक बात पूरा समय आन खड़ा हुआ है कि विभिन्न समाज , मंदिर प्रतिष्ठान , धर्मगुरु और कैश-रिच कंपनियां सामाजिक कर्तव्य को दृष्टिगत रख ब्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों सामूहिक स्वास्थ्य केंद्रों में आधारभूत सुविधाओं को शासन से पूछे बगैर बड़ी संख्या में ऑक्सीजन सिलेंडर डिजिटल x-ray पोर्टेबल मशीन सेमी ऑटोमेटिक ऑटोमेटिक एनालाइजर अत्यंत छोटे उपकरण जैसे थर्मामीटर पल्स ऑक्सीमीटर ग्लूकोमीटर बीपी इंस्ट्रूमेंट मास्क आदि उपलब्ध कराने हेतु प्रयास करें यदि छोटी-बड़ी पीएचसी सीएचसी को कुछ समाज या धर्मगुरु या कंपनियां मिलकर गोद लें और सालाना बजट की योजना बनाकर मानवीय एवं आंतरिक संसाधनों का समन्वय स्थापित कर ले तो परिदृश्य बदल सकता है यह तय है कि राज्य शास्त्रों के सीमित संसाधनों के चलते शासकीय विद्यालय और शासकीय चिकित्सालय दरिद्र अवस्था में हैं और यही स्थापना निजी क्षेत्र में बेहतर तरीके से संचालित हो सकती हैं तो शासकीय प्रतिष्ठान भी सहयोग से बेहतर हो सकते हैं जब बड़ी संख्या में सीटी स्कैन एनालाइजर इत्यादि इन शासकीय चिकित्सालय में उपलब्ध होंगे लोगों की प्रारंभिक स्तर पर ही हो जाएगी

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