Shanichara Temple

शनिचरा, सिद्ध मन्दिर

भारत वस्तुतः गांव में बसता है और गांव से ही देश समृद्ध है और गांव के चारों ओर फैले खेत किसान खलिहान से ही अनाज फल सब्जी दूध खोआ घी के साथ साथ गोबर के कंडे इत्यादि की भी पूर्ति निश्चित होती है. इन्हीं गांव में….संस्कृति पनपती है, पलती है पल्लवित होती है, और प्राकृतिक न्याय की अर्वाचीन परिभाषा सीखी जाती है. खेत खलिहान, फलों और फूलों से लदे और भरे वृक्ष, आमराई के साथ किसानी के पशु, दुधारू पशु तथा जंगली जीव एक विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र के अनमोल वाहक होते हैं.

गांव के इसी छोटे तंत्र में ईश्वर भी अपना स्थान पाए रहते हैं चाहे वह देवी स्वरूप में हों, मसान बाबा के रूप में हो या हनुमान जी के रूप में हों जो गांव को एक कोशिका के समूह की भांति जोड़े रखने में सफल होते हैं. और इन्हीं छोटे मंदिरों में से एक मंदिर से अपनी सिद्ध मान्यताओं के चलते प्रसिद्ध हो जाता है जो आसपास के सौ-दो सौ कोस के लोगों की आस्था का विनम्र केंद्र बन जाता है.

मध्यप्रदेश के उत्तर में स्थित मुरैना जिले में ऐन्ती गांव में ऐसा ही एक पवित्र स्थल है जहां शनिदेव का सिद्ध मंदिर है जो आसपास के जिलों जैसे मुरैना भिंड ग्वालियर दतिया इत्यादि स्थानों के ग्रामीण और नगरीय नागरिकों का आस्था स्थल है जहां प्रति शनिवार बड़ी संख्या में लोग पाठ पूजन के लिए उपस्थित होते हैं.

ग्वालियर के महाराजपुरा क्षेत्र, जो एयर फोर्स का बेस भी है, के निकट स्थित इस मंदिर को शनिचरा मंदिर के नाम से जाना जाता है जहां शनि देव की मूर्ति अनादि काल से स्थापित है और सिद्ध स्थल होने से प्रशासन पूर्ण व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग प्रदान करता है. न्याय के देव, शनि देव के समक्ष उपस्थित होने वाले प्रार्थी ना केवल शनिदेव को काले वस्त्र और काले तिल समर्पित करते हैं बल्कि शनि देव को प्रिय तेल भी समर्पित करते हैं जो समुचित प्रकार से छोटे स्टोर टैंक में डाला जाता है और पाइप के माध्यम से शनिदेव के ऊपर बूंद बूंद होकर अर्पित होता है. इसी परिक्षेत्र में श्री गणेश तथा हनुमान जी की मूर्ति भी प्रस्थापित है जो पर्याप्त रूप से सुंदर बनी हुई है. शनिचरा मंदिर के समीप 300 मीटर की दूरी पर लेटे हुए हनुमान जी की पूर्व मुखी मूर्ति भी त्रेता युग से स्थापित है जिनके बारे में कहा जाता है कि वह स्वास्थ्य एवं आयु प्रदान करते हैं. पौड़ी हनुमान जी के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर में भी भक्तों का तांता लगा रहता है.
ऐसी मान्यता है कि पौड़ी हनुमान जी के मंदिर की स्थापना त्रेता युग में हुई थी और कथानक कुछ इस प्रकार है कि परम पूज्य हनुमान जी जब श्रीलंका में रावण के दरबार में उपस्थित हुए थे और उनकी पूंछ में आग लगा दी गई थी तब वह लंका को जलाने के प्रयास में एक कारागृह में नौ ग्रह को कैद में देखे थे और उन्होंने न्याय के देवता शनि देव की रक्षा की थी और तब से श्री हनुमान जी शनिदेव के साथ यहां पर उपस्थित हैं इस प्रण के साथ कि सूरज की पहली किरण मुझ पर पड़ेगी फिर न्याय के देवता के ऊपर पड़ेगी.

गाँव की यात्रा का सुखद पहलू यह है कि ईश्वर के मूर्त रूप के दर्शन की अभिलाषा के साथ आपको नेवला, नीलकंठ, गौरैया, बगुला, कोयल, सारस,बैल, गाय, भैंस, बकरी, गिरगिट, सांप, कुकुर आदि के भी दिव्य दर्शन होते चलते हैं.
पवन देव के भव्य आलिंगन में नील आकाश के तले दमकते भास्कर के उर्जापाश में जब कुछ पल एकान्त के आपको मिल जाएं तो ईश्वर से जैसे मौन साक्षात्कार ही हो गया हो.

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आपकी हर यात्रा मंगल मय हो, साधु.

न्याय के देवता शनि देव जी
लेटे हुए हनुमान जी का मंदिर

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