द्रष्टा देवांश…. द्रश्य है देवज्ञ, पदार्थदिशा दश ओर.देशांतर में भी दिव्य दिखेद्रश्य सदा दर्शनीय.द्रष्टि, दीप्ति दर्श को,दिगपाल दैदीप्यदीपक द्रष्टि दोष नहीं,द्रष्टि देवता तुल्य.द्रष्टा देवांश है,देखने को दहके.दिशाहीन हो द्रश्य प्रपंच,द्रष्टा दीपो भवः.देवांश के दिग्दर्शन,दुर्धुशु ददाति दर्शनं.दधीची दीन्हे तन,तो दैदीप्य हुए दिव्यं.द्रष्टि दोष का दर्प,दरख़्त सा देहाभिमान.दुनिया दुखियारी देखि,दान भी दंडाभिमान.दुःख दया द्वैत,दंडकारण्य में दर्शन.दण्ड- दान... Continue Reading →