जीव मात्र का स्वभाव बदला लेने का है
और
जो क्षमा कर बदले का भाव छोड़ दिया दिया तो प्रकृति की लीला के सद्भाव के दौर की और एक क़दम बढ़ा दिया है
यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है
कुछ झूठ इकट्ठे हो तो बेशक़ सच्चा टूट जाता है
आप सबको ख़ुश नहीं कर सकते तो ये भी मत भूलना समय आपके पास भी सीमित है
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