1970 के दशक के अंतिम दौर में मानव जीवन के विभिन्न आयामों और आध्यात्मिकता के अनमोल और अद्वितीय व्याख्या के तर्कशास्त्री आचार्य रजनीश (कालांतर में ओशो) के द्वारा रचित “संभोग से समाधि की ओर” पढ़ने का अनुपम अनुभव हुआ. जितना उत्तेजक पुस्तक का शीर्षक है 464 पृष्ठों में उतने ही तीव्र और चुभने वाले विचार लिखे गए हैं जो आज लगभग पचास बरस बाद भी किसी भी सुधि-असुधी या ज्ञानी -अज्ञानी के मन और मस्तिष्क को उद्वेलित किए बिना नहीं रह पायेंगे.
आमतौर पर ओशो की रचनाओं के प्रति एक भिन्न क़िस्म का आकर्षण के साथ विकर्षण भी देखा जाता है जो एक विशिष्ट मानसिक स्थिति के वाहक हो सकते हैं. विशिष्ट प्रयोगधर्मी होते हैं वह जिन्होंने अपने मन मस्तिष्क को सदैव युवा रखने के प्रयास का विचार किया और ओशो के अनमोल साहित्य से अपने मन मानस मानुस को ज्ञान की जल-धारा और तर्क के साबुन से सराबोर कर लिया हो.
और धरोहर है जो जो कहा गया और जो जो लिखा गया वह लगभग छह सौ से अधिक पुस्तकों में संधारित है और इस पुस्तक के सोलह अध्यायों में प्रत्येक अध्याय पाठक को भिन्न प्रकार से सोचने के लिए मजबूर नहीं बल्कि बाध्य कर देता है जैसे-
“किसी भी कार्य को करने के लिए सहमति मृत व्यक्ति का परिचायक है आज्ञापालन गौण है आज्ञापालन बिना ऊर्जा जिसमें तर्क नहीं ऊर्जा भले ही वहीं दूसरी ओर किसी भी कार्य के परिचालन में न सोचने को नाटकीय अभिव्यक्ति या अस्वीकार करने और सोचने पर मजबूर करती है”
क्यों और कैसे?
प्रस्तुतिकरण रोचक तरीक़े से इस पुस्तक में अंकित है और मुझ जैसे ही तुच्छ के लिए पुस्तक पर व्याख्या बनना लगभग सोने को मिट्टी दिखाना है परंतु ब्लॉग लिखते रहने की आदत के कारण और पढ़ने की आदत के कारण इस पुस्तक के आंकलन के लोभ से मैं बच नहीं पा रहा हूँ… 50 से अधिक दृष्टांतों के माध्यम से तर्क को स्थापित करने के लिए मन बुद्धि अहंकार लोभ मद मोह प्रेम घृणा की व्याख्या का इससे बेहतर स्वरूप किसी अन्य के वक्ता के मुखारबिंद से प्रस्तुत होता प्रतीत नहीं होता है इस पुस्तक को पढ़ना न केवल एक अनुपम अनुभव है बल्कि जीवन के प्रति परिवर्तन की आशा लिए एक नई सीढ़ी पर पहुँचने का अवश्यम्भावी अत्मविवेचन भी है.
ओशो द्वारा लिखित वाक्यों का अवधारना किसी भी व्यक्ति के लिए विचारोत्तेजक हो सकते हैं जैसे-
- प्रेम की बात चल रही है प्रेम के गीत गाए जा रहे हैं प्रेम के भजन गाए जा रहे है और प्रेम का मनुष्य के जीवन में कोई स्थान ही नहीं है!
- इस जगत में कुछ भी ज़हर नहीं है परमात्मा के सारे उपक्रम में कुछ भी विश नहीं ऐसा मत है लेकिन आदमी ने सारे जगत को ज़हर कर लिया है.
- ग़लत सिद्धांतों को अगर हज़ारों वर्षों तक दोहराया जाए तो वह हम भूल जाते हैं कि सिद्धांत ग़लत है और दिखाई पढ़ने लगता है कि आदमी ग़लत हैं क्योंकि उन सिद्धांतों को पूरा नहीं कर पा रहा.
- मनुष्य से भी ज़्यादा प्रेम पशु और पक्षी और पौधों में दिखाई पड़ता है जिनके पास न कोई संस्कृति है न कोई धर्म है.
- जितना आदमी सब बेहद सुसंस्कृत और प्रभुत्व प्रभाव में है उतना ही प्रेम से शून्य होता चला जाता है.
- क़सम खाने वालों से हमेशा सावधान रहना ज़रूरी है क्योंकि जो भी क़सम खाता है उसके भीतर उस क़सम से भी मज़बूत कोई बैठा है जिसके ख़िलाफ़ वह क़सम खा रहा है. अगर ब्रह्मचर्य की कसमें खा रहा है एक हिस्सा खा रहा है मन का और नौ हिस्सा परमात्मा की दुहाई दे रहा है है
- अगर आप चाहते हैं कि कभी आपके जीवन में प्रेम की वर्षा हो जाए तो उससे दुश्मनी छोड़ दें.
- संभोग के क्षण में ही पहली बार यह स्मरण आया है कि आदमी को कितने आनंद की वर्षा हो सकती है संभोग के क्षणों में मन विचारों से शून्य हो जाता है जाता है.
- प्रेम हमेशा झुकने को राजी है अहंकार कभी भी झुकने को राज़ी नहीं है.
- प्रेम जब भी कुछ दे पाता है तब ख़ुश हो जाता है अहंकार जब भी कुछ ले पाता है तभी ख़ुश होता है.
- अब तक का सारा धर्म मृत्यु वादी है जीवन वादी नहीं उसकी दृष्टि में मृत्यु के बाद जो है वही महत्वपूर्ण. मृत्यु से पहले जो है वह महत्वपूर्ण नहीं अब तक के धर्म की दृष्टि में मृत्यु की पूजा है जीवन का सम्मान नहीं.
- सम्भोग भक्ति को गहरे से गहरे में ले जाता है और उस गहरा में दो घटनाएँ घटित होती हैं. सम्भोग के अनुभव में अहंकार विसर्जित हो जाता है एगोलेसनेस पैदा हो जाती है अहंकार नहीं रह जाता है एक क्षण को यह याद भी नहीं रह जाता मैं हूँ.
- दूसरी घटना घटी एक क्षण के लिए समय मिट जाता है टाइमलेसनेस पैदा हो जाती है धार्मिक अनुभूति के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है ईगोलेसनेस तथा टाइमलेसनेस.
- जगत में समाधि का पहला अनुभव मनुष्य को सेक्स के अनुभवों से ही प्राप्त हुआ है उपलब्ध हुआ है
- सेक्स कोयले की तरह है और ब्रह्मचर्य हीरे की तरह लेकिन वह कोयले का ही बदला हुआ रूप है.
- पशु अपनी नग्नता में भी अद्भुत है और सुंदर है उसकी नग्नता में भी वह निर्दोष है.
- महावीर जैसा व्यक्ति नग्न खड़ा हो गया तात्पर्य यह है कि जितना निर्दोष हो गया होगा इतना जैसे छोटे बच्चों का की भाँति नग्न खड़े हो गए.
- आज तो हम कपड़े पहनकर भी अपराधी में मालूम होते हैं हम कपड़े पहन कर भी नंगे हैं और ऐसे लोग भी रहे हैं जो नग्न होकर भी नग्न नहीं थे
- प्रेम अकारण होता है प्रेम कारण सहित नहीं होता.
- घृणा से भरा हुआ व्यक्ति, वस्तुयें समझता है मनुष्यों को, प्रेम से भरा हुआ आदमी वस्तुओं को भी व्यक्तित्व देता है.

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