दो भाई(541)

दो भाई
सुलझे हुए
उच्च स्तरीय किसान
अपने काम से काम रखने वाले
राजनीति से दूर
सधा अपने में मस्त
माता पिता ने जीते जी अपनी विशाल खेती आधी आधी बाँट दी, यह सोच कि कोई झगड़ा न हो, असंतोष न हो भाइयों में और यदि हो तो तो मेरे सामने हो, मेरे बाद नहीं.

नवाचार सोच

भाई भी ऐसे दोनों की कोई की ज़मीन छोटे को दे दो बड़ा बोले बच्चों की साझा फ़ीस मैं अकेला भरूँगा. जैसा आपसी निर्मल भारत-रत्न का सोच.

फिर भी पिता के जीवित रहते आपस में झगड़ गए है. भले तू तू मैं मैं नहीं हुई परंतु आपसी लिहाज़ तल्ख़ी है और आपस में अबोला हो गया.

क्यों और कैसे?

परिवार में जहाँ आपस में धन के बँटवारे का प्रश्न न हो और पर्याप्त धन सभी पक्षों के पास हो वहाँ श्रेष्टता की अघोषित तुलना और दौड़ एक कारण बन उठ खड़ी होती है.
आपस में सम्मान से व्यवहार की शैली में परिवर्तन का भी स्थापित स्थान है.
न्याय पीड़ित के पक्षधर होने का अहंकार विवाद का विषय बनता है.
किसी पक्ष का अंध समर्थन विवाद का विषय बनता है.
अहंकार, श्रेष्ठता का विवाद का विषय बनता है. अवहेलना का विवाद का विषय बनता है.
अतिप्रेम का प्रदर्शन भी का विवाद का विषय बनता है.
ज्ञान निष्ठुर नहीं बनता है परंतु ज्ञान का घमंड का विवाद का विषय बनता है .

मेरे अहम यह में होने की पुष्टि में कमी मेरे ही परिवार के सदस्य के द्वारा संतुष्टि न होने पाए
मेरे होने की अवस्था का मान, मेरे अहंकार को भंग किया गया.
धन का भौतिक विषय से भिन्न है विवाद रसायनिक विषय है
विचार कीजिएगा भौतिकता और रासायनिकता के
संजाल में भौतिक रस सोने चाँदी जैसी धातुओं और मुद्रा राक्षस के वशीभूत हो मन को जकड़ लेता है वहीं अहंकार , लोभ, वासना का रसायनिक तत्व मन को जकड़ लेता है

मानव स्वभाव झगड़ालू है जो झगड़े में कंफर्ट जोन बनाए रखता है या कंफर्ट झोन में झगड़ा करना आसान है

और जो जकड़ा हुआ मुक्त हो गया वह कलियुग में बुद्ध तत्वों को अग्रेषित हो गया

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