दो मित्रों का गरमागरम संवाद-
पीड़ित- इसने मेरा ट्रांसफर किया है मैं इसकी 12 बजा दूँगा.
मित्र- ये 12 बजाना क्या होता है ?
पीड़ित- मतलब मैं इस अधिकारी की व्यवस्था लगा दूँगा !
मित्र- अरे भाई, व्यवस्था लगाने में क्या होता है ?
पीड़ित- अरे मेरे कहने का मतलब ये हैं कि मैं इनका बाजा बजा दूँगा !
मित्र- अरे भाई तू सही तो बोल कि तू चाहता क्या है?
पीड़ित- उसने मेरा तबादला किया है, विद्वेष और जलन की चलते. तो मैं इसका बदला लूंगा.
मित्र- कहाँ, किस नए नगर में तबादला हुआ है?
पीड़ित- अरे नहीं यहीं हुआ है, सेक्शन बदल दिया है.
मित्र- अरे! यह तो कोई बड़ी बात नहीं हुई.
पीड़ित- अरे तुम क्या जानो सरकारी नौकरी के कष्ट. अभी तक मैं मेन स्ट्रीम में चाक-चौबंद विभाग का अधिकारी था. अब मुझे हटाकर गोबर-गणेश विभाग में कर दिया है
मित्र- गोबर गणेश?
पीड़ित- अरे लूप लाइन में कर दिया है.
मित्र- तो क्या हुआ!
पीड़ित- अरे मेरी साख को कितना बट्टा लग जाएगा.
मित्र- कितना?
सन्नाटा. पीड़ित चुप रह गये
मित्र- एक गाना याद आ रहा है
पीड़ित- मेरे दुख में तुझे गाना याद आ रहा है.
मित्र- “क्या हुआ, इक बात पर बरसों का याराना गया
इस बहाने दोस्तों का प्यार पहचाना गया, क्या हुआ, क्या हुआ. क्या हुआ, इक बात पर बरसों का याराना गया”
पीड़ित- कहना क्या चाहते हो?
मित्र- अरे यार, किसी को थप्पड़ रसीद करोगे तो चोट तो हाथ में भी लगेगी ना. और जब कार्य भार ग्रहण किया था तो किसी ने कहा था कि सदैव लाइमलाइट में रहोगे. क्या किसी कुर्सी पर बैठने का अधिकार तुम्हारा ही है. पट्टा लिखा है क्या. प्रभु लीला या समय का फेर भी तो हो सकती है.
पीड़ित- मेरे को पाठ न पढ़ा.
मित्र- मित्र है तू मेरा, सही बात तो कही जाएगी. तू मत मान. सुन, राजकुमार राम का राजतिलक होने वाला था एक दिन और पूर्व रात्रि को ही चौदह बरस का वनवास आ गया. वे ईश्वर तुल्य थे तो इतना लंबा लीला का समय मिला और हम तो थोड़े दिन में ही लौट सकते हैं. स्वीकार करना सीखो. और वो अधिकारी जो तुम्हारे ग़ुस्से के कारक हैं जिसकी तुम बारह बजाना चाहते हो, वे तो निमित्त मात्र हैं. समय के खेला के वाहक मात्र हैं. उनके कर्मों के फलों के वाहक तुम क्यों बनना चाहते हो. वे अपना कर्म और कर्तव्य पालन को उत्सुक हैं तो कर्म फल के भी उत्सुक होना पड़ेगा! समझा कुछ?
पीड़ित- तू तो गीता पाठ करने लग गया है जो मुझे समझ नहीं आती है
मित्र- अरे, नदी के बहाव में बहना सीख. प्रतिरोध करेगा तो कष्ट बढ़ेगा. स्वीकार कर समय के बहाव में बहना, सुधि मन की पहचान है. साधारण मन तो बदला लेने की ही सोचेगा जैसा तू सोच रहा है. साधु मन होने का अभ्यास कर सकता है तू कि सावन हरे न भादों सूखे याने हर सम विषम स्थिति में सम भाव का पालन. तू नहीं, और सही.और नहीं और सही.
पीड़ित- यह तो बड़ा भीरु भाव हुआ. अब क्या उस कल के अधिकारी से डर जाऊं. उसके सारे काले धंधे पता हैं मुझे, ग़ैर चारित्रिक भी है. वाट लगा दूँगा!
मित्र- तो वह भी तुम्हारी पोल जानता होगा.
पीड़ित- जाने भले. मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा.
मित्र- ऐसा नहीं है दोस्त.जब समय बदल रहा हो शांत बैठी. बचपन के दोहे तो याद ही होंगे अभी भी या भूल गए?
पीड़ित- कौन सा?
मित्र- निंदक नियरे रखिए
और रहीमन चुप हो बैठिए देख दिनन का गेट.
पीड़ित- ये सब भ्रामक बातें हैं !
मित्र- अच्छा ये बता सिकंदर पौरुष की कथा याद है जिसमें युद्ध हारने के बाद भी पौरुष, सिकंदर से राजा जैसा व्यवहार करने को बोलते हैं!
पीड़ित- हाँ, याद है, तो.!
मित्र- हर व्यक्ति अपने अच्छे – बुरे क्षेत्र का राजा होता है. तेरे नए रूप में भी तू अभिनव प्रयोग कर नया जादू उत्पन्न कर सकता है. प्रतिभा संपन्न हो तुम तो जंगल में भी मंगल कर सकते हो.
पीड़ित- तू तो मुझे साधु बना के छोड़ेगा.?
मित्र- अरे अभी देख चार साल से यूक्रेन-रूस युद्धरत हो एक दूसरे को जमींदोज करने में लगे हैं. निर्णय हुआ क्या अभी तक? नहीं ना! तू समझ.
पीड़ित- हाँ भाई समझ आ रहा है. मैं जॉइन कर लेता हूँ !

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