एक अति चर्चित और लोकप्रिय मूवी देखने के लिए एक उच्च कोटि के थिएटर में जाने का अवसर हुआ और देखो, मुझे क्या मिला?

वॉशरूम के पास पीने के पानी का एक उच्च स्तरीय जल काउंटर था (जिसे प्याऊ नहीं कहा जा सकता) और पानी पीने के लिए कागज़ से बने डिस्पोजेबल गिलास भी एक पृथक ट्यूबनुमा पात्र में स्थित थे. लोग ड्रॉप डाउन मेन्यू की तरह ट्यूबनुमा पात्र से कागज़ का गिलास निकालकर, वाटर कूलर के नल से पीने का पानी भर कर पी रहे थे और फिर स्टील फ्रेम के कचरा-बॉक्स में कागज़ का गिलास फेंक रहे थे जो पास में ही रखा था.
इस पॉइंट तक, सब ठीक था, लेकिन मैंने कागज़ का डिस्पोजेबल गिलास नहीं लिया और पानी के नल के सामने झुककर अपने हथेली का चुल्लू बनाकर पानी पिया, जैसा हम बचपन में उन पुराने दिनों में पानी पीते समय करते थे. और उसी समय मैं निकट खड़े लोगों के लिए आश्चर्य और कौतूहल का विषय बन गया.
उन्नति
आगे की ओर और उन्नति
विकास और
फिर और प्रगति ने, हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में एक तरह की कृत्रिमता ठूँस दी है. और हमने पहले की तरह देशी (नैचुरल) बनकर रहना बंद कर दिया है. अपने हाथों से, सीधे नल से पानी पीना काफी मुफ़्त था, किसी को कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता था.
और साथ ही, ज़्यादा कीमत पर पानी पैदा नहीं करना पड़ता था. और अब मानव संसाधनों के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों और ऊर्जा का प्रयोग करते हुए पीने के पानी की मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति भी कुलीनता और विलासिता का विषय बना दी गई है.
क्या सच में?
क्या मैं आपका ध्यान इस बात की ओर दिला सकता हूँ कि कैसे हम देशीपन के प्राकृतिक स्वरूप से यदा कदा साक्षात्कार कर सकते हैं-
1.
जब हम ज़मीन पर मिट्टी में नंगे पैर चलते हैं या
2.
ज़मीन पर पालथी आसन में बैठकर खाना खाते हैं या
3.
चुल्लू से पानी पीते हैं या
4.
गर्मियों में सत्तू का घोल पी लेते हैं
5.
अपनी पसंदीदा पुस्तक पढ़ लेते हैं
या
6.
7.
8.
कुछ भी जो आपको पसंद हो, ताकि हम थोड़ा प्राकृतिक बने रहें.
कृपया एक प्राकृतिक गतिविधि आप भी जोड़ें जो देशी होने को बढ़ावा दे.
डिस्पोजेबल या अन्य जैसे उत्पादों का उपयोग कदाचित कम हो.
विचार कीजिएगा…
I appreciate ur thinking.Simple life make everything available for every one.
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Thanks Boss.
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