Govt. OPD

सरकारी अस्पताल की ओ.पी.डी. में आने वाले भारतीय नागरिक न केवल समझदार होते हैं बल्कि अपनी विशिष्ट मांग के वशीभूत हो स्मार्ट-प्ले करते हैं. श्रम विभाग की बीमा योजना के अंतर्गत आने वाली सरकारी सेवाएँ रोगियों की माँग के हिसाब से मैनेज करना अति जटिल होता है. आज कुछ ऐसा ही हुआ.

आज 38 वर्षीय एक लगभग स्वस्थ और हृष्ट – पुष्ट हितग्राही श्रमिक रोगी का आना हुआ और अपनी परेशानी बताए कि कमर में ३ दिनों से दर्द है और स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन सामने कर दिए कि उपचार में यह कमर-पट्टा (Tailors Brace) लिख दीजिए.

ऑनलाइन के इस दौर में सबके हाथों में स्मार्ट फ़ोन हैं. ये हैंडसेट-धारक इंटरनेट के माध्यम से चलित रील के माध्यम से बहुत सारी चीज़ें की मार्केटिंग की जा रही है. इस सुविधा ने सभी उपभोक्ताओं को साधारण ज्ञान के साथ साथ विशिष्ट निर्णय लेने हेतु भी प्रेरित कर दिया है परिणाम चाहे जो हो.

बीमा सेवाओं में सभी प्रकार की साधारण से लेकर उच्चतम श्रेणी की औषधियों एवं अन्य उपागम/उपकरण जैसे कृत्रिम बत्तीसी (डेंचर), चश्मा, क्रत्रिम आँख भी दिए जाने के निःशुल्क प्रावधान हैं. जिसका लाभ हितग्राही का अधिकार है. परंतु, चिकित्सक के क्लिनिकल कौशल को परे रख अपने सद्ज्ञान को सर्वोपरि स्थापित करना लोकतंत्र की खूबी हो कदाचित्.

मेरे द्वारा रोगी का परीक्षण किए जाने पर कमर की मेरुदंड के दोनों और उपस्थित मांसपेशियों में तनाव पाया गया.
क्योंकि कोई चोट इत्यादि कोई इतिहास नहीं था और पर्याप्त औषधियों के लिखे जाने पर भी वे इस बात के लिए अड़े रहे कि कमर का यही बेल्ट लिख दिया जाए और उन्हें वह मिल जाए!

ऐसी स्थिति में चिकित्सक की स्थिति बड़ी ही दयनीय हो जाती है, आवश्यक न होते हुए भी लिख दिया जाए तो शासन के राजस्व की हानि होने का भय और न लिखा जाए तो रोगी द्वारा चिकित्सक के विरुद्ध नाम समेत सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराने का भय.

एक ओर अंतरात्मा का शंखनाद तो दूसरी और आत्मसम्मान पर कोबरा दाँव!

एक और रोगी सज्जन आज ओ पी डी में प्रस्तुत हुए और सीधे बगल में आकर सम्मान देते हुए सीधे मेरे पैर छुए. तभी मैं समझ गया कि इनकी माँग कुछ ऐसी बढ़िया आएगी जो मेरे अंतर-द्वंद का विषय बनेगी. आरंभिक संवाद के बाद हर्निया के उपचार याने शल्य क्रिया के लिए पूर्व से ली हुई आठ दिन की छुट्टी को अतिरिक्त आठ दिन बढ़ाने की माँग आ गई जबकि पूर्व में सलाह ये दी गई थी कि अनुबंधित चिकित्सालय में जाकर ऑपरेशन करा लें.

बोले, मैं तो हर्निया की दवाई खा रहा हूँ उस से आराम हो जाएगा ! आप तो छुट्टी लिख दीजिए.

मैं लगभग निरुत्तर ही हो गया. क्या करें जब रोगी हित और शासन हित के साँड़ सामने सामने हो अपने सींग आपस में फँसा लें

इस तरह की समस्याएं न केवल बहस का विषय प्रस्तुत करती हैं बल्कि चिकित्सकों के लिए कार्य करने की कठिन दौर से भी साक्षात्कार कराती है.

कोई उपाय हो तो बतलाइएगा?

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