Last Moment!

अभी हाल में जिनवाणी छुल्लक श्री जैन संत ध्यान सागरजी के पुनर्जन्म संबंधी एक उद्बोधन को सुनने का सुखद संयोग हुआ जिसमें उनके द्वारा एक अत्यंत सम्मोहक बात कही गई कि आत्मा की यात्रा जन्म और मृत्यु के बीच नहीं है बल्कि मृत्यु के दिन नए रास्ते पर प्रशस्त हो जाती है. जीवन की यात्रा न जाने कितने सौ जन्मों से चलते चली आ रही है और कितने और जन्मों तक आगे क्या होना है जिसकी जानकारी उन्हें कर्मों अथवा पुण्य कर्मों के अनुसार न तो ज्ञात है और ना ज्ञात होने पायेगी !

मृत्यु के संबंध में मेरी स्वयं की भी कुछ अवधारणा है और इसके प्रति स्वागत करने का मेरे मन में जो विचार है उसमें महावीर, बुद्ध और ओशो समेत जैन संतों का बड़ा प्रभाव पड़ा है.

ऐसा विचार आता है कि जिस क्षण मौत से युक्ति और शरीर मुक्ति का अवसर उत्पन्न हो तब दो अवस्थाएँ मन – मस्तिष्क, भाव-भंगिमा, विचार – विमर्श में आत्मा में प्रज्वलित होना चाहिए कि

१. यह यात्रा तो बड़ी सही स्वर्ग स्वरूप जैसी रही और ईश्वर प्रदत धर्म – कर्म का पालन बख़ूबी किया गया. कृतज्ञ भाव कुछ इतना वृहत हो कि जीवन दाता, माँ- पिता, प्रकृति और परम तत्व के द्वैत और अद्वैत सिद्धांत से परे हो चेतना बस ब्रह्मलीन हो जाए बिना विचारे, बिना लोभ के, बिना घृणा- विद्वेष, बैर या वैमनस्यता के, आभार, धन्यवाद और साधुवाद के नार्मल सत्संगी सद्भाव से.

२. दूसरी स्थिति की अवस्था की कल्पना है कि जैसे ही शरीर त्याग हो तत्क्षण, इस मायालोक में छूटी लीला की ओर पुनः क्षण भर को भी देखने का लोभ ना हो और मुँह फेर सीधे परम तत्व के प्रकाश को उद्यत होने का श्रम स्वतःस्फूर्त हो जाए !

कुछ इस प्रकार मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने का प्रयास यदाकदा करता हूँ ताकि शरीर त्याग के समय , संशय की स्थिति न हो और मुक्ति का भाव कुछ इस प्रकार आलोकित हो कि क्षण भर में इह: लोक से और परलोक की यात्रा फलीभूत हो जाये.

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑