JeewanBodh!

मानव जीवन के दौर के अतरंगी कैनवास पर विभिन्न सतरंगी रंग कुछ इस प्रकार होते हैं कि जब शिशु जन्म लेता है तब मूल भाव यह होता है कि बस जीवित रह जाए और स्वस्थ रह जाए

इस बात का सिद्धांत और आवश्यकता प्रचलित रहती है परंतु जब महाविद्यालय में प्रवेश का समय हो तो उच्च पाठ्यक्रम के साथ उच्च श्रेणी के महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय में दाख़िले के दंभ और गर्व साझा किए जाने के अवसर खोजने का लोभ परे नहीं रह पाता है चाहे वह परिवार के बीच हो मित्रों के साथ. यह स्वयम् – संतुष्टि से संबंधित है.

दौर बदलता है और विवाह के जोड़े अपने जीवनसाथी के प्रोफाइल का दंभ और गर्व प्रस्तुत करने के लिए निरंकुश आतुर हुए चले जाते हैं चाहे वह परिवार और मित्रों या समाज में एक भिन्न अनुभूति का दृश्य क्यों ही न हो.

दौर फिर बदलता है और मित्रों परिवारों और समाजों में एक दंभ और गर्व होना प्रस्तुत किया जाता है कि मेरे ये संतानें हैं और यहाँ उनका प्रोफाइल है. सामाजिक व्यवस्था में चेतन अथवा अवचेतन चेतना के वशीभूत आप खोखली या ठोस प्रतिष्ठा के प्रदर्शन के दौर में जाने अनजाने प्रदर्शन किए चलते हैं.

मध्य अवस्था तक पहुँचते पहुँचते मित्रों, परिवारों, रिश्तेदारो समाजों में प्रस्तुत करने के लिए एक नया मापदंड आर्थिक प्रतिष्ठा भी है जहाँ नए बड़े मकान या फ्लैट के साथ नई कारें और जवाहरात के प्रदर्शन के माध्यम से मायालोक में माया की लीला का आविर्भाव प्रस्तुत किया जाता है

फिर आता है 60 का दशक बुढ़ापे का पद और जहाँ आपके पीछे आपके लिए ये परम्परा(लेगेसी) का पृष्ठभूमि (बैकड्रॉप) तो प्रस्तुत होता ही है साथ ही अपने रिश्तेदारों – दोस्तों के मध्य आपकी बीमारियों का प्रोफाइल भी प्रस्तुत किया जाता है जहाँ कहीं अपने घुटने के दर्द का उपचार प्रत्यारोपण जैसी स्थितियां विकट परिदृश्य को प्रस्तुत करती है तो उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कैंसर जैसी बीमारियों के उपचार में लगातार निरंतर किए जाने के प्रयास मरघट तक जारी रहते हैं.

आख़िरी सांस में शान – शौक़त, मान -प्रतिष्ठा, वैभव, धन-दौलत, घृणा-द्वेष, लाभ-हानि सब अग्नि के आँचल में राख में परिवर्तित हो जाता है

मिथ्या भ्रम रह जाता है, क्षणिक श्मशान वैराग्य के साथ कि ये सब तो मेरे साथ नहीं ही होने का.

समय अनीरश्वरवादी है!

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