Password

पासवर्ड के दलदल में कैसे मैं होता गुड़ गोबर!

कंप्यूटर पर सबसे पहले आपकी अपनी अद्वितीय लॉगिन आईडी डालो
फिर अद्वितीय पासवर्ड डालो
फिर आप मानव हो कंप्यूटर नहीं वाला कैप्चा डालो और फिर मोबाइल पर एसएमएस माध्यम से आए वन टाइम पासवर्ड (ओ टी पी) को डालो तब ये वेबसाइट का मकड़जाल खुलेगा और आप अपनी मनचाही सुरक्षित पर क्लिक कर वित्तीय, साहित्यिक या अवित्तीय कर पाने की अनुमति होगी!

बाप रे !

जटिलता में सुरक्षा है या सुरक्षा में ही जटिलता है.! यह तो तय है कि इंटरनेट के तालाब में सुरक्षा का बड़ा खतरा है जब मगरमच्छ से तालाब भरा हो. कागज पर लिखे बिना या हस्ताक्षर किए बिना जब लेंन-देन के वित्तीय काम हो रहे हों शून्यता में डिजिटल हो के तो हम परतंत्र हो गए हैं, प्रतीत होते हैं. सुधि से सुधि व्यक्ति को भी गिरगिट जैसे स्वरूप को निरंतर बदलते रंग जैसे परिदृश्य से वेबपेज में पासवर्ड बदलना ही होते हैं. प्रवेश करने के पहले सुरक्षा दीवार में खुल जा सिम सिम जैसे पासवर्ड का उद्घोष, सुरक्षा के लिए श्रम साध्य है जटिल भी हैं.

सीमा पर तैनात सैनिक की बुलेट प्रूफ़ जैकेट की भाँति अपने खाते के पासवर्ड को स्कैम – प्रूफ सुरक्षा बनाये रखने को हम सब कुछ इस तरह मजबूर है कि पासवर्ड हमारे जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण संग्राम – तत्व हो गया है

आज के डिजिटल दौर में पासवर्ड का सृजन और फिर 180 दिनों के बाद पुनः सृजन और फिर भूल गए पासवर्ड के साथ फिर नए पासवर्ड का रुझान सभी नागरिकों के लिए एक जटिल और आफ़त जैसी परेशानी वाला कार्य हो गया है चाहे आप डायरी पर अपना पासवर्ड बार बार लिखे अथवा मोबाइल फ़ोन के डिजिटल पासवर्ड लॉकर में सुरक्षित रखें और उस डिजिटल लॉकर का भी पासवर्ड याद रखें और फिर स्मार्ट फ़ोन के पासवर्ड या पैटर्न स्मरण करके रखें.

पहले सारे ऑनलाइन खाते के संचालन के लिए अनिवार्य पासवर्ड पर्सनल डायरी में लिखकर रखें. उनके सीक्रेट आंसर सुरक्षित करके रखें फिर भी पास -स्वोर्ड जैसा कि नाम सही प्रतीत होता है अंग्रेज़ी के तलवार शब्द के अनुवाद स्वोर्ड की भाँति आपके सिर पर गिरने को तैयार खड़ा रहता है. यदि आप भूल जाए.

किसी ज़माने में मकान, दुकान, गोडाउन के मुख्य दरवाज़े या तिजोरी के ताले को खोलने के लिए भी जिस तात्विक चाबी की सुरक्षा हिफ़ाज़त संभाल की जाती थी वह सम्मान आज डिजिटल युग में पासवर्ड को प्राप्त है. हालाँकि घर दुकान व्यावसायिक प्रतिष्ठान में लगने वाले ताले एक उच्च स्तर पर डिजिटल लेवल प्राप्त कर चुके हैं जो बायोमेट्रिक अर्थात चेहरे की संरचना अथवा अंगूठे के या ऊँगली के निशान से अथवा अंकों के विस्मित किये जाने योग्य समायोजन से खुलते हैं जिससे ताले चोरों के द्वारा खोले जा सकने की संभावनाओं से दूर हो गए हैं. कुछ इसी स्तर पर कार और दोपहिया वाहन की चाबी का दौर भी अब दूर चला है और इन्फ्रारेड संकेतों के माध्यम से अब कार खोली जाती है बंद की जाती है या चालू की जाती है. और तो और हवाई यात्रा के लिए हवाई अड्डे पर प्रवेश के समय भी सुरक्षा मानकों के अनुसार चेहरे के बायोमेट्रिक, उंगली के निशान और बोर्डिंग पास के क्यू आर कोड के स्कैन के माध्यम से ही पहचान सुनिश्चित कर प्रवेश एक नए लेवल पर पासवर्ड की परिभाषा, उपयोगिता और परिपालन को स्थापित करता है.

कहने का तात्पर्य हैं कि सॅटॅलाइट के इस दौर में हर चीज़ अब डिजिटल लेवल पार हो गई है परंतु मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, टीवी कंप्यूटर, वाई फ़ाई कनेक्शन, बैंक खाते, पेमेंट पोर्टल जैसे उपागम भी बायोमेट्रिक डिजिटल ताले की रचना को स्वीकार करते हैं ताकि कोई अनजान व्यक्ति खोलने ना पाए जिसे आमतौर पर स्पैमर कहा जाता है. परंतु ये डिजिटल ताले स्वयं एक बड़ी ही कमज़ोर कड़ी हैं जिसे पासवर्ड या सुरक्षा का तानाबाना बोलते हैं जिन्हें ढेढ़ श्याने स्पैमर्स एन केन प्रकरण सेंध लगा ही देते हैं. अब इलेक्ट्रॉनिक युद्ध के दौर में बैंक खाते या डिजिटल प्लेटफार्म की सुरक्षा इत्यादि रजिया फँस गई गुंडों के बीच जैसी स्थिति का सामना निरंतर करते हैं जहाँ स्पैमर्स और स्कैमर्स तो गुंडे हैं और आप -हम जैसे नागरिक निरीह और लाचार रजिया! जरा से त्रुटि हुई और सब गुड़ गोबर.

डिजिटल पासवर्ड एक अजब दुनिया प्रस्तुत करता है जहाँ अंकों, अक्षरों, मुहावरों, वाक्यांशों तथा असामान्य क्रम में जमाए गए माध्यम से पैदा किए जाते हैं. ये पासवर्ड आपके इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के खुलने के साथ साथ सर्वर तक पहुँचने का श्रम करते हुए आपके व्यक्तिगत पेज को खोलने का और कार्य करने का उपक्रम करते हैं. इस पासवर्ड की कमज़ोर कड़ी इतनी कमज़ोर है कि इसे निरंतर बदलना पड़ता है और कई बैंक तो इस पासवर्ड के सही अंकित किए जाने के बाद भी वन टाइम पासवर्ड की धरोहर के माध्यम से आपके मोबाइल में आए छह अंकों की माँग भी प्रस्तुत करते हैं जो आपके ही इस ग्लोबल दौर में आपके आपके खाते के द्वारा ही खोले जाने के पुष्टि की निश्चित पुष्टि करने का श्रम करता है.

पासवर्ड याद रखना आज कल न केवल जटिल कार्य हैं क्योंकि ईमेल अड्रेस, बैंक के खाते, मोबाइल पेमेंट प्लेटफार्म और इंटरनेट पर आधारित जितने भी कार्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हैं उसमें पासवर्ड की जानकारी निरंतर बदलती रहने की माँग उत्पन्न होती है और भूल जाने की डिजिटल विकल्प प्रस्तुत होने के बाद भी पुराने पासवर्ड नए पासवर्ड को दो बार टाइप करके स्थापित करना वैज्ञानिक आइयंस्टीन जैसे मेधावी ज्ञान स्तर की माँग करता प्रतीत होता है

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑