Free Gyan

जो आता है ज्ञान दे के चला जाता है!

रिक्त हूँ क्या?
या मेरे मौन को मेरी सुलभ मूर्खता समझा जाता है.

संचार के सैटेलाइट दौर की भरपूर दौर में ज्ञान की गंगा नहीं प्रशांत महासागर बह चला है जो मुझे ज्ञान दे दे कर निहाल किए हुए है.

जो भी मेरे स्मार्ट फ़ोन के सोशल मीडिया की मेरी मित्र सूची में हैं, उन्हें प्रतीत होता है कि इस अल्पज्ञानी महामूर्ख को स्नान करा दो ताकि देर से ही सही अब समग्र रूप से इसका शैक्षणिक, मानसिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और प्रायोगिक विकास हो जाये.

ओशो भगवान के जीवन और मुक्ति संबंधी प्रवचनों की श्रृंखला से आरम्भ होने वाली प्रातःकालीन सोशल मीडिया पोस्ट जहाँ मेरे अंतर्मन को झकझोर
देती है वहीं शुभचिंतकों का प्रेम मुझे भगवतगीता के श्लोकों के माध्यम से प्रतिदिन का कर्म का सिद्धांत पिला दिया जाता है और मैं निरीह पांडव सा महाभारत के इस रणक्षेत्र की ज्ञानगंगा को अपने भीतर समाहित करने का प्रयास करता चलता हूँ.

सामाजिक मित्रों का यह अनुकरणीय प्रयास न केवल मेरे संवर्धन को प्रतिबद्ध है बल्कि कुछ ज्ञानमार्गी डिजिटल रूप में प्रेरक सामाजिक पोस्ट्स में तो निर्देश भी आदेशात्मक रूप में नीचे अंकित रहते हैं कि इस पोस्ट को आगे भेजो. समाज सुधारो भले अपन भतेरे भ्रष्ट बने रहो.!

तात्पर्य स्पष्ट है कि आप तो सुधरो न सुधरो अपनी मित्रसूची में उपलब्ध ज्ञानी-अज्ञानी को भी इस गंगा से सराबोर कर दो.

इस दौर में भी नए कवि और नए कथाकार अपनी लेखनी के ओजस्वी प्रस्तुतीकरण से एक नई प्रशंसा के प्यासे होकर मेरे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपनी लेखनी की कड़ाही से भिन्न भिन्न रचनाओं के उत्पाद उड़ेलते रहते हैं.

उससे भी आगे तो ख़तरनाक स्थिति तब बनती है जब पुराने गानों पर हाथ आज़माते नए नवेले अप्रशिक्षित नवजात गायक अपने आधुनिक कराओके बैकग्राऊंड के साथ अपनी गायन शैली प्रतिभा का अनुभव लगभग अनिर्वचनीय अस्वाभाविक प्रस्तुति प्रस्तुत करते हैं जो प्रशंसा की चाह से की गई होती है परंतु सामने वाले श्रोता के लिए त्रास से कम नहीं होती है.

जबरा मारे और रोने भी न दे की पुरानी कहावत चरितार्थ होती प्रतीत होती है

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑