Ujjain kite flying(492)

उज्जैन महाकाल क्षेत्र के नीले आसमान पर मकर संक्रांति के दिन उड़ती पतंगों को देखते देखते मुझे मेरे बचपन के उज्जैन की याद आ गई जब स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई के अस्सी के दशक के दौरान उज्जैन में रहना हुआ और मकर संक्रांति के पर्व पर पतंग उड़ाने के अभिनव आनंद से भी अभूतपूर्व साक्षात्कार हुआ.

पतंग उड़ाना न केवल एक कौशल पूर्ण खेल है बल्कि मनोरंजन के साथ साथ प्रतियोगिता के नए चैलेंजिंग आयाम प्रस्तुत करता है विभिन्न प्रकार की पतंगों जैसे गिलासिया, दुपट्टा, चांद-तारा, कौवा,मोती डग्गा आदि के पतंग प्रकार उपलब्ध होते थे जिसमें धागा या डोरी बाँधना भी एक कला हुआ करता था.

पतंग के सिर की तरफ़ चार गठान तो नीचे की तरफ़ तीन गठन के साथ बीच की दांडी का शोध पूर्वक तुला अध्ययन करने के बाद डोरी से बंधन नियत करने की प्रक्रिया पूर्ण की जाती थी. पहली उड़ान पर पतंग एक और झुकती लगे तो हल्की तरफ़ कागज या कपड़े की खिरनी बंध कर पतंग बैलेंस के जाती थी.

आज के आधुनिक दौर में जब रेडीमेड चीनी डोर उपलब्ध है तब कॉटन की डोर के माँजा के स्वरूप में बदलाव भी एक सहयोग प्रोजेक्ट हुआ करता था. इस कार्यक्रम में तीन – चार लड़कों की मदद से बारीक पिसा हुआ काँच, सरेश, नील, आटा जैसे तत्वों के मिश्रण से सादे धागे को धारदार माँजे में बदल दियाजाता था.
और सर्दियों की छुट्टियों में यह काम पूरा दम लिया जाए ताकि मकर संक्रांति के दिन पूरे समय घर की छत पर या मैदान में या सड़क पर पतंग उड़ाने का टकटकी कार्यक्रम निर्विघ्न सम्पन्न हो.

साधारण धागे को धारदार बनाने के लिये माँजा सूत कर धारदार बनाना, कागज की पतंग बनाना, फॉर बाँधना, उड़ान के लिए छुट्टी देना ताकि पतंग को एयरबोर्न किया जा सके के एम बी ए नुमा छोटे छोटे प्रयोग और अनुभवों से दो चार होना किसी भी पतंग उड़ान जिज्ञासु प्रह्लाद के प्रयास धीरज और कौशल की ये नित प्रति परीक्षा होती थी और जब पतंग आसमान पर चढ़ जाए तो अपनी उड़ती पतंग को देख हर्षित मन की कोपलें कुछ इस प्रकार सफलता का अभिमान देती थी कि युवा होते मन की अवस्था मैं समझ पाना लगभग मुश्किलें हो होता था.

उड़ती पतंग और उस पर लगी लंबी डोर के सिरे पर यह प्रफुल्लित मन गर्हित भाव से भरा होकर कभी इधर तो कभी उधर देखे. पड़ोसी लड़के और लड़कियाँ देखते हुए कि क्या अनिल भैया या अनिल पतंग उड़ा रहे हैं और ऐसे में कोई अपनी पतंग की डोर के आस पास कोई दूसरी मदान्ध पतंग की डोर आ जाए तो यह एक खुली चुनौती होती थी कि अपनी पतंग बचा लो या पेंच लड़ा लो. तब वह धारदार माँजा काम आता था.
पतंग उड़ाने की कला में निष्णात पतंग वीर भिन्न स्तर पर पेंच लड़ाने की कला का प्रभावी प्रदर्शन करने वाले अपनी पतंग और साख दोनों बचा ले जाते हैं. और जब पतंग के पेंच लड़ जाते तो कहीं इस उजली और गुनगुनी धूप में नैन भी लड़ जाया करते थे, जो प्रेम पाती के आरंभिक दौर का द्योतक होते थे.

पतंग कटने के बाद एक और विषय सम्मुख प्रस्तुत होता था कटी हुई पतंग के लूटने का जिसके लिए छोटी उम्र के बच्चे और युवा होते जवान दौड़ पड़ते थे. और वो अपने इस पतंग की दौलत के लिए अपना सर्वस्व झोंकने को तैयार हो जाते थे. अब तो देखने को नहीं मिलता अब तो उस ज़माने में लंबे बांस और झक्कड़ लेकर पता नहीं क्या प्रयास किए जाते थे जैसे किलो -दो किलो सोना जाएगा. सोना मिले ना मिले जो आत्मिक अनुभूति प्राप्त होती थी किसी सफलता को प्राप्त करने पर वह अद्भुत थी.

एक बार पतंग लूटता देख, माँ ने पिताजी को बता दिया तो पिताजी अगले दिन 10 नई पतंग ला दिये कि अब अपनी पतंग खूब उड़ाओ. दिल की बतायें , बिलकुल मन ही नहीं हुआ इस नई पतंग को उड़ाने का जो रोमांच था लोगों की लूटी हुई पतंग को उड़ाने का.

बचपन के दिन.

Leave a comment

Blog at WordPress.com.

Up ↑