MR: Dhurandhar (481)

आदित्य धर द्वारा निर्मित धुरंधर चलचित्र को देखने का अवसर हुआ. बहुत सारी फ़िल्म समीक्षा सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर लिखी जा चुकी हैं, कही जा चुकी है सुनाई जा चुकी है इसलिए एक अन्य समीक्षा लिखने की इच्छा नहीं है परंतु इसमें कोई दो मत नहीं है कि पहली बार भारतीय जासूस रूप में उच्चतम श्रेणी के सैनिकों के बलिदान को रेखांकित किया गया है

देश की अवधारणा में नागरिकों के मात्र जन्म लेने, जीवन बिताने, धन कमाने और मर जाने मात्र से भर नहीं होती है बल्कि देश की अस्मिता, सुरक्षा, साख और विकास के लिए प्रगति के नैतिक प्रयासों के अतिरिक्त मरना और मारना के नैतिक दायित्वों का परिपालन भी करना पड़ता है. देश के भीतर भी राष्ट्र -विरोधी तत्व हैं तो उस देश की सीमाओं से बाहर भी और इन राष्ट्र विरोधी तत्वों पर नियंत्रण तो करना ही होगा इस हेतु दुश्मन देश में अपने प्राण पूर्ति के लिए देश सुरक्षा में प्राणों का त्याग करने को जासूस उद्यत हो जाता है.

पहली बार इस चलचित्र के माध्यम से देश के जासूसों में छुपे सैनिक का शौर्य और पराक्रम प्रकाशित और प्रस्तुत हुआ है जिससे न केवल किसी भी देशभक्त नागरिक के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, मर्द की आँखों में खून उतर आता है.

बहुत सारी बातें कही जा रही है कि किसी विशेष वर्ग के संदर्भ में ये बातें कही गई हैं परंतु वे सभी तो दुश्मन देश के पाकिस्तानी नागरिक थे. यह भी तो कहा गया है कि हिंदू डरपोक क़ौम है और चुनौती दी गई की हम पड़ोस में रहते हैं जब मन हो आकर निपट लेना. बुरा तो इस कथन का भी लगना चाहिए फिर तो!

इसमें कोई दो मत नहीं कि सनातनी लड़ने को तैयार नहीं है वह शांतिप्रिय जीवन का स्वामी है, हामी है परंतु जब एक बार वह तलवार उठा ले या लड़ने को को तैयार हो जाए तो वह अपने शरीर कौशल, बुद्धि कौशल और युद्ध कौशल से युद्ध जीतने में कोई कसर भी नहीं छोड़ता है. आज की संतति को यह चलचित्र अनिवार्य रूप से देखना चाहिए कि देश की सेहत किस तरह उच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए तंत्र को कितने प्रयास करने होते हैं और कितना चौकस रहना पड़ता है ताकि देश सुरक्षित रहे, नागरिक सुरक्षित रहें और उन्नति की राह पर देश तेज दौड़ लगा सके.

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