CCTV : Character Builder

द्वापर के संजय और कलियुग के सी.सी.टी.वी.
डा अनिल भदौरिया

अपराध की दुनिया में दाग अच्छे हों… कदाचित, सामाजिक परिवेश में दाग अच्छे नहीं. नियमों का पालन ना करना मानव संस्कृति की सबसे आसान अनुशासनहीनता है जो, दाग अच्छे हैं…, को प्रोत्साहित करती है. परन्तु अब कैमरे के लेंस की द्रष्टि ने दाग और दागदार दोनों की पहचान आसान कर दी है.

संजय, महाभारत युद्ध के महा-उवाच के पुरोधा, ईश्वर प्रदत्त दिव्यदृष्टि के वाहक, जैसा सुना- वैसा बोलने वाले दृष्टांत का कथन करने वाले व्यक्तित्व का दौर गुज़र चुका. यह वह समय था कि जब स्वयं भगवन श्रीकृष्ण सामाजिक मूल्यों की पुनः स्थापना के लिए लीलारत थे जहाँ लोभ, घ्रणा, अपराध, अनैतिकता जैसी बुराइयों का प्रभाव बढ़ रहा था. दाग अच्छे नहीं थे!

सच ही कहा गया है कि परिवर्तन, प्रकृति के समस्त घटकों का एकमात्र स्थाई नियम है और यह भी कहा जाता है कि इतिहास अपने आप को दोहराता है तो दिव्यदृष्टि का दौर पुनः उपस्थित है जहाँ कहने को तो मानव संस्कृति के इस आधुनिक दौर तक पहुँचाने में दो विशिष्ट घटनाओं का विशेष स्थान है. पहली है, भाषा का विकास और दूसरी है पहिये का आविष्कार. ये दो तत्त्व मानव के विकास यात्रा के मील का पत्थर माने जाते हैं अपितु चित्र निकलने वाले फोटोग्राफिक कैमरे के विकास ने तो पृथ्वी और प्रकृति के सौन्दर्य की प्रस्तुति को एक अभूतपूर्व रंग दे दिया है.

महामना संजय का दौर पुनः उपस्थित है. महाभारत काल में जिस दिव्य दृष्टि से सम्राट धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र से मीलों दूर हस्तिनापुर में युद्ध के दृश्यों का दर्शन कर दृष्टांत सुनाए गए थे.

दौर बदला. विद्युत का प्रवाह तार संयोजन पर हुआ और बल्ब का आविष्कार हुआ. विज्ञान और आगे बढ़ा चित्र को हूबहू प्रस्तुत करने वाला कैमरा बना तो दूर-ध्वनि अंतरित करने वाला दूरभाष उपकरण, टेलीफोन भी बना परंतु क्रांति तो तब आई जब स्मार्टफ़ोन में वीडियो रिकॉर्डिंग और सीसीटीवी कैमरे की निगरानी रखे जाने तकनीक का विकास हुआ. कलियुग में जन्मे इस दौर के नागरिकों पर निगाह रखने में ये कैमरा तंत्र सफल साबित हुआ. वैधानिक सुरक्षा तथा घटना उपरांत साक्ष्यों की प्रस्तुती और न्यायालयीन स्वीकार्यता के चलते एक अनिवार्य भय उत्पन्न हुआ है. क्या दाग अच्छे हैं…की तर्ज पर कैमरे अच्छे हैं, का अनुशासन सम्मत तंत्र विकसित हो पायेगा?

आश्चर्य का विषय है कि अनैतिक कर्मों के पनाह-स्थल, सड़क नियमों के आदतन उल्लंघनकर्ता और घटित अपराधों के दृश्य निरंतर चलने वाले कैमरों की रिकॉर्डिंग की निगाह से बच नहीं सकते हैं. राष्ट्रिय राज-मार्ग पर स्थापित शुल्क-टोल पर सीसीटीवी , अस्पताल के वार्ड-कॉरिडोर में सीसीटीवी, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में सीसीटीवी, चौराहों पर पुलिस निगरानी के सीसीटीवी, कॉलोनी और रहवासी संघों के प्रवेश द्वार, सड़कों तथा घरों के दरवाज़े बैक लेन में सीसीटीवी से पल प्रतिपल की निगरानी का समुचित संजाल बिछता जा रहा है. यहाँ तक कि घर के भीतर लगे कैमरे के संयोजन से घरेलू हिंसा और चोरियां भी पकड़ी जा रही है. दाग पकड़े जा रहे है.

लाभ यह हुआ है कि इन कैमरों के कारण अपराध करने के पूर्व भय मिश्रित एक नैतिक सोच का प्रादुर्भाव हुआ है जो सामाजिक व्यवस्था में शुचिता और शुद्धता की स्थापना के लिए अनिवार्य घटक बन रही है. समाज में शुद्धता की स्थापना में जो योगदान दिया है वह परिवार की संस्कृति में संस्कार की घुट्टी पिलाने से कतई कम नहीं है.
रही सही कसर स्मार्टफ़ोन में उपस्थित वीडियो रिकॉर्डिंग ने पूरी की है. क्या घटना, क्या दुर्घटना और क्या अपराध सब कैमरे पर रिकॉर्ड होकर सर्वर पर संरक्षित हो रहा है. भले ही आप अपने संज्ञान से वीडियो चित्र निरस्त कर दें, प्रशासनिक तंत्र, न्यायिक तंत्र और साइबर पुलिस तंत्र अपराध के दिन,समय विशेष पर आपकी स्थान विशेष पर उपस्थिति, कॉल-लोग, पिक्चर और वीडियो के दर्शनीय प्राप्ति कर ही लेगी.

भारत के प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण गतिविधि में भी पोलिंग – बूथ में लगे सी सी टी वी के माध्यम से पारदर्शिता और सत्यता की सुनिश्चित गारंटी स्थापित हो रही है और आम नागरिक के प्रजन्त्रिक पारदर्शिता के मूल्यों की प्राकृतिक न्याय के अनुकूल स्थापना के प्रयास हो रहे है. माने या ना माने, विडियो कैमरा रिकॉर्डिंग के परिस्थितिजन्य साक्ष्यों ने परिद्रश्य बदल दिया है. दाग बचने ना पाएंगे.

जासूसी के बढ़ते आयामों के चलते इतने सूक्ष्म कैमरे पर्याप्त रिकॉर्डिंग सुविधा के साथ उपलब्ध है कि सामने वाले की जानकारी के बिना आपसी बातचीत, लेन -देन, अश्लील व्यवहार सबकी पर्याप्त रिकॉर्डिंग की जा सकती है जो इतने छोटे बटननुमा वीडियो कैमरे के माध्यम से हो सकती है कि जिनकी उपस्थिति ही पता ना पड़े. पेन के क्लिप पर या शर्ट की बटन पर लगे हों या टोपी या चश्मे पर या अंगूठी पर लगे हुए कैमरे. जासूसी एजेंसी विवाह पूर्व संबंधों के आंकलन, विवाह पश्चात् व्याभिचार और कॉर्पोरेट संबंधों में भी इन सुविधाओं का उपयोग कर रही हैं.

यह कैमरे में रिकॉर्ड होने का भय का वातावरण सामाजिक शुद्धता के लिए अच्छा है. सरकारी कार्यालयों में भी भ्रष्ट आचरण के प्रकरणों की संख्या बढ़ कर पकड़े जा रहे है जहाँ विडियो रिकॉर्डिंग ने एक भिन्न स्तर का भय का माहौल प्रस्तुत कर दिया है. दाग अच्छे हैं…का दौर गया और अब कैमरे अच्छे हैं…

महाकवि संत तुलसीदास जी ने अपने एक दोहे में कहा भी है कि भय बिन ना होए प्रीति, अर्थात तंत्र में भय के तत्त्व का समावेश ना हो तो अनुशासनहीनता पनपती है और घर, समाज और देश की उन्नति नहीं होने पाती है. भय तत्व के बिना नागरिक भावना या सिविक सेंस के साथ साथ चरित्र निर्माण भी संभावना है और इसी भय से राष्ट्र के विकसित देशों की श्रेणी में सम्मिलित होना संभव है.

विकसित परिवार या विकसित समाज या देश, भय की एक छोटी अपितु समुचित ख़ुराक न केवल उत्पन्न करते हैं,लगातार प्रस्तुत रखते है और बराबर उसका उच्च स्तर बनाए रखते हैं ताकि नागरिकों की ना केवल अनिवार्य सुरक्षा हो सके बल्कि अनिवार्य अनुशासन के दायरे में चरित्र निर्माण भी हो सके और इसी अनिवार्य अनुशासन की अनिवार्यता के चलते सभी प्रतिष्ठानों सड़कों पर क्लोज सर्किट टेलीविज़न कैमरे का प्रादुर्भाव हुआ, स्थापना हुई और इसके चलते अब स्थिति ये हैं कि लालच होने पर भी दुकान से चोरी, सड़क परिचालन में ट्रेफिक नियमों का उल्लंघन, मकान में घुसकर चोरी जैसे छोटे और बड़े अपराधों में कमी अंकित हुई है.

भय बिन न होए प्रीति.

दाग आज भी अच्छे नहीं हैं… परन्तु कैमरे अच्छे हैं…

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