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ये दुनिया मोर्स कोड (अबूझ भाषा) में है जिसे सदियों से मानव डी-कोड करने की कोशिश कर रहा है. आर्य भट्ट, वराह मिहिर, न्यूटन और आज के वैज्ञानिक इसी कोशिश में है कि
यह सौर मंडल कैसे निर्वात में टंगा है
ब्रह्माण्ड कितना बड़ा है
पृथ्वी पर समुद्री जल इतना क्यों है और
वायु में ऑक्सीजन का प्रतिशत इक्कीस ही क्यों है ?
मानव व अन्य जीवों का जीन कोड क्यों है
कोई गोरा है तो कोई काला
तो क्यों कोई लंबा बोना
कोई ग़ुस्सैल विनयी,
सुंदर कुरूप क्यों और कैसे हैं ?
यह गुप्त जीवन है कि खुला !
मृत्यु क्यों है तो पुनर्जीवन है भी कि नहीं !
मृत्यु के बाद क्या है ?
आत्मा है यह सिर्फ़ ऊर्जा का 1 छोटा पुंज जो जीव, पौधे में एक समान प्रवाहित वो जान निकली शरीर निर्जीव बन जाए.
नियम से सूरज के चारों और पृथ्वी का भ्रमण, मौसमों का आना जाना,
होता 24 घंटे का दिन रात क्या आप ये जान पाएँ क्या है
क्यों है
कैसे हैं और
कब से हैं
कब तक रहेगा ?!
हमारे पुराण जन्मे तो कर्म का सिद्धांत बताते हैं और जो यहाँ कर्मशील है वे अमरत्व हेतु सपना देखते हैं …
शरीर या जीवन से अंतहीन मोह माया का न छूटने वाला बंधन और 1 अंधी दौड़,
बचपन से जवानी
फिर अपने बच्चों का बचपन से जवानी
फिर अपने पोतों- नातियों का बचपन से जवानी फिर अंत में आत्म-ऊर्जा का विचरण इस लोक से इतर-इतर या यहीं कहीं पृथ्वी पर कहीं के लिए, अन्य आवृत्ति में धड़कने को या स्पंदित होने को.
आत्मा के चारों और माया का घेरा है
माया में जीवन का बंधन उकेरा है
अबूझ भाषा है इस अनंत लोक में
मोक्ष मुक्ति हूरें और स्वर्ग भ्रम बहुतेरा है

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