
बचपन ?
वह दौर जब आप शिशु नहीं हैं!
तो आप किशोर भी नहीं हुए हैं, वयस्क होना तो अभी दूर है.
बचपन वह दौर है जब आप मन से निरे शुद्ध हैं, निष्कपट, निष्कलंक, प्राकृतिक रूप से न्यायसंगत, सच से पीड़ित और निर्वात जैसे रिक्त.
बचपन का धारक, सच का हामी हो प्राकृतिक न्याय का हामी होता है जो निपट प्राकृतिक स्वास्थ है. प्राकृतिक गुण है. चार बरस का बच्चा भी जो बात नैनो से देखी, सही है सच है उसी बात का कथन करता है. माँ पिता के कमरे में भी धड़ाम से घुस नहीं जाता है.
प्रकृति की लीला का शुद्धता रूप इसी दौर में परिलक्षित होता है. बचपन नहीं जानता की वाकई में क्या कोई कार्य निषिद्ध है. सामाजिक व्यवस्था में निश्छल बचपन छल से पीड़ित होता जाता है.
बचपन ही वह संवेदनशील दौर है जब आपकी नैसर्गिक शुद्धता को ठोक पीटकर, छल, कपट, मद, मोह, लोभ, प्रमाद, असत्य से प्रशिक्षित कर दिया जाता है कि
अपना भला पहले देखो.
सच न बोलो.
जीतने के लिए धक्का देना पड़े तो दो.
झूठ बोलो.
विष वमन भी करो.
संस्कार का ढोल चाहे जितना कूटा जाए, सामाजिक व्यवस्था में जीवित बने रहने के निहितार्थ से बच्चे को बचपन से ही स्मार्ट बना दिया जाता है.
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