स्क्रीन प्रेम और मैं बंधक प्रेमी

ऐसा लगता है जैसे प्राचीन कहानियों में वर्णित राक्षस की जान पिंजड़े में बंद तोते में रहती है,वैसे ही मेरे प्राण मेरे मोबाइल में बसते हैं.
किसी ज़माने में मेरे पास खेलने के लिए समय था ,
पढ़ने के लिए समय था और तो और काम करने के लिए भी समय था
और कथानक ऐसा बदला विज्ञान के रास्ते कि पूछो मत!
80-90 के दशक में माध्यम वर्ग के घरों में भी एक दिन घर में टेलीफोन आया लैंडलाइन वाला जिसने मित्रों रिश्तेदारों और व्यवसायिक बातचीत की तेजतर्रार व्यवस्था को स्थापित किया
जो तार आधारित था. फिर यह सब तार की दुनियाँ से विलग हो दूरसंचार तरंगों पर आधारित हुआ, याने वायरलेस.
वायरलेस के एक दौर में पेजर आए फिर अत्याधुनिक परंतु आत्मघाती सेल-फ़ोन आया और फिर उसके बाद अत्याधुनिक तकनीक के सृजन से मैं ही मेरा नहीं रह पाया.
इंटरनेट नामक सॉफ्टवेयर के आविष्कार ने भी मोबाइल फ़ोन पर तहलका मचाया. और इस तरह सेल फ़ोन का परिवर्तन स्मार्टफ़ोन में हुआ और उसके बाद हम ही हम ना रहे.
मेरी झुकी हुई गर्दन,स्मार्ट फ़ोन की स्क्रीन पर केंद्रित निगाहें और वातावरण से बेख़बर विश्व दुनिया जहाँन, समाज और ब्रह्मांड की खोज करता मैं स्मार्ट मोबाइल धारक. यह यक्ष प्रश्न है कि आख़िर स्मार्ट कौन है, मैं या ये मेरा हाई-एंड फ़ोन.
मेरे मन में यह प्रश्न उत्पन्न करता है कि विकास की इस दौड़ में अब हम कितनी तेजगति से बिना बिजली के दौर से आज बिना तारों के टेलीफोन की सुविधा के भोगी हो गए हैं. मेरे हाथों में सेल फ़ोन की उपस्थिति अपराधी के हथकड़ी की भाँति प्रस्तुत हुई है जिसके हाथों में बना रहना, एक अनिवार्य स्थिति तो है ही
2013 से जब स्मार्टफ़ोन का प्रादुर्भाव हुआ और लोगों के हाथ में है इंटरनेट से चलने वाला टचस्क्रीन मोबाइल फ़ोन से सामना हुआ तो ऐसा लगा जैसे 70MM की पुराने समय की थिएटर में फ़िल्म जैसा अनुभव हुआ.
सरकार की नागरिकों के लिए सरल योजनाओं और सेवा प्रदाताओं के सस्ते इंटरनेट पैकेज के चलते क्या ग्रामीण
क्या शहरी
क्या गंदी बस्ती और
क्या कुलीन बस्ती
सभी ओर सस्ते से लेकर महंगे मोबाइल फ़ोन और उस पर चिपकी आँखें यत्र तत्र सर्वत्र दर्शनीय होने लगी
गण गण के सामने दृष्टि दृश्य और दृष्टा बनकर उपस्थित हो गई है, यह मोबाइल स्क्रीन और यह दृश्य दृष्टा की दृष्टि के लिए किसी नशे की लत के भाँति इस प्रकार से जनमानस में स्वीकार किया है कि इससे कोई नहीं बच पाया है. गृहणी श्रमिक यात्री यहाँ तक की दो साल के छोटे शिशु भी इस स्क्रीन प्रेम से पीड़ित हैं जैसे ये मछुआरे द्वारा डाली गई कांटे में मछली के गले में फँसी हो न तो छूटती है न मर पाती है.
क्या छूट हो पाएगी इससे!

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