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लगभग 30 साल से अमेरिका में निवासरत एक भारतीय के मानस में किस प्रकार परिवर्तन होता है उसका उदाहरण यहाँ है –

जब वो पूर्ण देशी पहले बरस में अमेरिका से भारत आते समय किसी के पूछे जाने पर कि कहाँ जा रहे हो ? इस नए नवेले अमेरिकन का उत्तर होता था,
यार मेरे प्यारे घर जा रहा हूँ !
और अमेरिका वापस लौटते में उसके शब्दों होते थे कि,
वापस जेल जा रहा हूँ!

दूसरे, तीसरे, चौथे बरस में यह भावना बलवती हो इस प्रवासी भारतीय के भारत भ्रमण की यात्रा ख़ुशमय हो उछलते कूदते यह बयान करती थी कि –
भाई घर जा रहा हूँ घर अपने देश !
और भारत छोड़ते में उसके शब्द होते थे कि-
बड़ी मुश्किल होती है यार वापस काम पर पर जाने में.

पांचवें से दसवें साल में पूछे जाने पर कि कहाँ जा रहे हो तो प्रति उत्तर मिलता था –
यार, इंडिया में भी घर है वहीं जा रहा हूँ!
और वहाँ से अमेरिका को लौटते मे इन देशी के चहकते शब्द होते थे –
यार घर वापस जा रहा हूँ.

अगले 10-15 साल अमेरिका में रहते में जब भी अमेरिका से भारत की यात्रा हो जाते समय पूछे जाने पर लगभग अमेरिकन हो चुके ये नाथ कहते थे –
थोड़ा दिन के लिए ये इंडिया टूर पे जा रहा हूँ!
और वापसी पर पूछे जाने पर यह आसान शब्दों थे कि –
घर जा रहा हूँ!

कामकाज के सिलसिले में विदेश गए भारतीयों के पहले दशक में भारत से वापसी के समय इन पूर्ण भारतीयों के लिए दुखी मन हो कामकाज के लिए धनोपार्जन के लिए घर छोड़ना हृदयविदारक है.
अमेरिका की लत पड़ते ही 10-15 साल बाद जब भारतीय जब देश स्थित घर की यात्रा करते हैं तो भारत से अमेरिका की उनकी वापसी होती है तब उनका वाक्य उत्साह लगन आत्मीयता बता देता है कि घर बदल चुका है!

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