Like Ants (Blog 435)

रविवार की सुबह का भ्रमण करने के बाद एक जगह पर बैठकर ज़मीन को निहारते हुए देखा कि ज़मीन पर भोजन के कुछ दाने पड़े हैं और उन्हें चीटिया बटोर कर ले जा रही हैं. पीछा करने पर मालूम पड़ा कि वे एक सुरंग से भोजन ले जाकर एकत्र करने का कार्य कर रही हैं . पास ही दीमक की एक बाँबी भी देखने को मिली जहाँ एक अति विकसित कॉलोनी की स्थापना हो रखी थी जिसमें संभवतः भोजन के वातानुकूलित भंडारगृह भी बने होते हैं जैसा कि ऐसे उदाहरणों से मालूम पड़ता है.

बाम्बी और घरों को देखकर न जाने कैसे मन में यह विचार आ गया!
सोचा है कभी कि मानव जाति की एकत्र करने की प्रवृति आजीवन रहती है!

अनाज का एकत्रीकरण, धन का एकत्रीकरण, यश-अपयश का एकत्रीकरण या अन्य कुछ और. आप कभी ऐसे किसी जीव को जो इस तरह धन अनाज का संग्रह करते हों, बमुश्किल ढूँढ पाएंगे. चाहे वो स्तनधारी जीव हों या अंडा देने वाले सरीसर्प या उड़ाने वाले पक्षी. हरे भोज पर निर्भर हिरण हाथी गाय भैंस जैसे जंगली या सामाजिक जीव या मांसाहारी, कोई जीव परिग्रह से पीड़ित नहीं.

कभी कभी तो आश्चर्य होता है कि इन जीवों के जीवन में ईश्वर के प्रति विश्वास का जो भाव है वह मानव जीवन में तो दिखाई पड़ता ही नहीं रहा है. पक्षी प्रतिदिन उड़ान भर अपने भोजन की तलाश करते हैं. अन्य भूचर, वायुचर और जलचर जीव पल प्रतिपल अपने भोजन की तलाश में बने रहते है परंतु इन जीवों को कभी भूख से मरते हुए नहीं देखा.

परंतु हाँ, छोटे जीव जैसे चींटी, दीमक, चूहे, गिलहरी, कौवे , कठफोड़वा और मधुमक्खी आड़े दिनों के लिए आवश्यक वनस्पति अनाज के टुकड़े संजोकर रखते हैं क्योंकि वे बिलों में रहते हैं और आपदा की स्थिति में भोजन संचय कर रखते हैं.

परंतु मानव प्रजाति की जमा करने की प्रवृत्ति तो अद्वितीय है जो जितना ना खा पाए या व्यय कर पाए उससे ज़्यादा जमा कर रखती है और प्रकृति के सबके भोजन की व्यवस्था के स्थापित प्रावधान पर विश्वास न करते हुए नास्तिक की भाँति स्वयं के ke बाहुबल पर एकत्र करने की बुराई का हृदय से पालन करती है.

जंगल में वास्तविकता का यह भाव जो प्रकृति की लीला से उत्पन्न जीवन में दिखाई पड़ता है वह मानव मैं तो दिखाई पड़ता ही नहीं. परिवार की परंपरा चीटियों में होती है जो पहले अनाज को एकत्र कर अपने कॉलोनी में स्थापित कर देती है

क्या हम चींटी-दीमक मानस से पीड़ित है ?

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