तीरे तीरे नर्मदा – पुस्तक समीक्षा

मातृ-भाषा में लिखी पुस्तक को पढ़ना अपने आप में अत्यंत संतोष का विषय है और हिंदी में लिखी पुस्तक यदि यात्रा वृतांत स्वरूप में हो जो बहते जल के मूल तत्व की जीवनी जैसा प्रसंग प्रस्तुत करे तो पढ़ने का अनुभव सोने पे सुहागा जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है. इस पृथ्वी पर हज़ारों वर्षों से नदियों का प्रादुर्भाव रहा है परंतु एकमात्र पावन नदी नर्मदा है जिसके 1312 किलोमीटर लंबे प्राचीर से दोनों ओर न की पैदल परिक्रमा किए जाने का सामाजिक परंपरा है. नर्मदा परिक्रमा पर मूर्धन्य लेखक अमृतलाल वेगड़ की पुस्तक तीरे तीरे नर्मदा पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और यह एक जीवंत अनुभव है. नर्मदा के दोनों ओर लगभग 4000 किलोमीटर की साहसिक परिक्रमा करने के अनुभवों को साझा किया गया है जिसे पढ़ते पढ़ते उनकी लेखनी पर गर्व होता है बल्कि इस दुर्लभ और दुरूह कार्य करने का लेखन श्रम-परिश्रम आँखों की पोर को नम कर देता है.
इस पुस्तक के पठन से अभिनव अनुभव से पाठक को अनुग्रहित करता है. अपनी सारगर्भित लेखनी से कविता की भाँति गद्य लेखक अमृतलाल वेगड़ नर्मदा के तीरे तीरे यात्रा करते करतेहुए प्रकृति, मानव, समाज और नदी के सौंदर्य का वह चित्र प्रस्तुत किया है जो दुनिया की किसी पुस्तक में कदाचित ही आप को कभी प्राप्त हो.
वैसे तो मध्य प्रदेश के पूर्व में अमरकंटक नामक पावन स्थल से नर्मदा नदी का उद्गम होता है जहाँ पर छोटा बच्चा भी अपने दोनों पैरों से उछल कर नदी के के दोनों छोरों पार कर लेता है और यहीं से उछलती नदी अपने रेवा रूपी प्रवाह स्वरूप को आल्हादित करती भारत के पश्चिम में स्थित गुजरात में खम्भात की खाड़ी में विलीन होती हैं जहाँ इसी नर्मदा नदी का पाट लगभग 20 किलोमीटर चौड़ा है जो अविश्वसनीय सा प्रतीत होता है.
इस यात्रा वृतांत की ख़ूबी यह है कि इस यात्रा में स्वयं यात्री की जीवन गाथा के दर्शन भी होते हैं. यदा कदा यह संशय भी उत्पन्न होता है यह पुस्तक पढ़ते पढ़ते यह यात्रा वृत्तान्त है या जीवन वृतांत यानी ऑटोबायोग्राफी. फिर ऐसा प्रतीत होता है यह यात्रा में जीवन वृतांत है और जीवन में यात्रा वृत्तान्त है.
प्रकृति में एक सार होने का दुर्लभ मानस प्रत्येक व्यक्ति में असंभव है परंतु जिस भी व्यक्ति मैं या जाग्रत हो जाता है वह न केवल प्रकृति प्रेमी हो जाता है वह ईश्वर की बनायी इस रचना के परमाण्विक स्तर तक अपने आपको विलीन कर सकने की क्षमता का प्रदर्शन कर देता है
वैसे भी जब भी नर्मदा नदी के दर्शन का अवसर प्राप्त हो तो यह नदी अपने 1312 किलोमीटर लंबे दौर में है. शांत प्रपात और उछलती सिमटती लहरों को अपने विभिन्न स्वरूपों में प्रदर्शित करती चलती है जिसे लेखक ने बखूबी दर्शाया है. जहाँ जबलपुर में माह धुँआधार जल प्रपात एक अद्भुत धरोहर की भाँति प्रस्तुत होता है तो महेश्वर में सहस्त्रधारा की कालजयी रचना हृदय मन मस्तिष्क और नयन सभी को उद्वेलित ही कर देती है लेखक अमृतलाल वेगड़ के भागीरथी प्रयासों से नर्मदा के सौंदर्य का जो वर्णन प्रस्तुत किया गया है वह अकल्पनीय अनिर्वाचनीय अवर्णनीय तथा अविस्मरणीय भी है.
हालाँकि अब नर्मदा नदी माई की परिक्रमा की यात्रा बस से 20 दिन में कार से चौदह दिन में और बाइक से करना चाहें तो बारह दिन में ही पूर्ण होती है परंतु नर्मदा के किस्सों की गहराई से पकड़ करनी हो अश्वत्थामा के किस्सों को जीना होगा या नर्मदा माई को स्पष्ट रूप में सामने देखने के अविस्मरणीय अनुभव से साक्षात्कार करना हो तो 3 वर्ष तीन माह तेरह दिनों का यह अनुभव अद्भुत ही रहा होगा जिन्होंने ऐसे पूरा किया है सुधी पाठकगण इस पुस्तक के पठान से उस यात्रा की एक झलक अवश्य प्राप्त कर सकते हैं जो कदाचित हर व्यक्ति के भाग्य लेख में न हो.
Leave a comment