
आध्यात्मिक दृष्टि से सोचा जाये तो घर वापसी एक निरंतर होने वाली प्रक्रिया है. यह मानव जीवन, श्रीराम के 14 वर्ष के बनवास के घटनाक्रम की तुलना में मृत्युलोक की वनवास अनुरूप यात्रा है जिससे वापसी अनिवार्य ही है. जिस दिन घर- वापसी होगी उस दिन त्योहार मनाया जाएगा या दुख मनाया जाएगा, यह यक्ष प्रश्न हो सकता है क्योंकि जीवन की सामाजिक व्यवस्थाओं में स्थापित स्वर्ग-नर्क की परिभाषा अनुसार तुच्छ और क्षीण प्रतीत होती है. शरीर त्यागने के पश्चात घर वापसी का गंतव्य इससे कहीं उच्चतर एवं श्रेष्ठतर है. कदाचित्!
दीपावली एक विशेष दिन है जो धार्मिक, भौतिक और व्यावसायिक सरोकारों के साथ साथ आध्यात्मिक तत्वों की भी पुष्टि करता है. दीपोत्सव के अमावसी त्योहार के नेपथ्य में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास भोगने के बाद घर वापसी का घटनाक्रम है जब श्रीराम के 14 वर्ष के नैतिक कर्मों की पूर्ति पश्चात प्रभु श्रीराम घर लौटते है और अयोध्या के सामाजिक व्यवस्था में खुशियों का सामुद्रिक उत्सव मनाया जाता है.
हम भूले रहते हैं पृथ्वी लोक से घर वापसी हर उस ऊर्जा से संचित एवं सिंचित जीवन का अंतिम कर्म है जो प्रत्येक जीवमात्र के शरीर के लिए भी आबंटित है संभव है कि आत्मा रूपी ऊर्जा घर वापसी में हमारे सौरमंडल के एकमात्र तारे सूर्य के अग्नि स्त्रोत में विलीन हो जाएँ. यह भी संभव है कि ब्रह्मांड के किसी अन्य लोक में आपका विमान उतरे या किसी अन्य पृथ्वी में आत्मा का यह प्रकाशपुंज उपस्थित हो जाए.
यह भी संभव है की घर वापसी में आपका यह ऊर्जा पुंज इसी पृथ्वी की किसी अन्य फ़्रीक्वेंसी पर संचालित अन्य दुनिया में किसी अन्य रूप में पंच तत्वों के वशीभूत हो नया जन्म प्राप्त कर लें. कल्पनाएं उड़ान भरती हैं और मायालोक की लीला एक पहेली की तरह इस जन्म में उपस्थित होती है और घर-वापसी उस पहेली का समाप्त हो जाना है.
क्या सही कहा ?
इस पावन पर्व के अनंत शुभकामनाएँ. जय हो, विजय हो, मुक्ति हो.

विचार कीजिएगा!
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