
Published in Hindi Daily Newspaper Nai Dunia Indore Edition DT 16.10.25
अथ श्री पोहा पुराण – अल्पाहार का विजयी खिलाडी
अनादिकाल से जिस प्रकार से यह यक्ष प्रश्न है कि पहले मुर्गी हुई या अंडा! उसी प्रकार से मध्यप्रदेश के मालवा की आहार-नगरी इंदौर में भी यह प्रश्न अपने शाश्वत स्तर को प्राप्त कर चुका है कि पोहे नामक अल्पाहार से इंदौर शहर प्रसिद्ध है या इंदौर नगर से पोहे की प्रसिद्धि है. स्वाद मिश्रित, संस्कार की धरोहर को यदि बचपन से बुढ़ापे तक की कसौटी पर कसा जाए तो इंदौर में सुबह के नाश्ते में पोहे का वह स्वर्णिम स्थान है जो किसी अन्य अल्पाहारी भोजन तत्व को प्राप्त नहीं है.
कहने को तो पोहा अल्पाहार की श्रेणी में रखा जाता है परंतु इन्दौर के पोहा-प्रेमियों ने चावल से निर्मित इस भोज्य-पदार्थ को नाश्ते के अतिरिक्त रात के भोजन तक में सम्मिलित किया है. और इसी कारण पोहे को इन्दौरी-वैश्विक अल्पाहार की अलबेली श्रेणी प्राप्त है. इन्दोरी-पोहे की पहचान का यह सर्वप्रिय आलम है कि न केवल मध्य-प्रदेश, यह भारत देश के साथ साथ जहाँ जहाँ विश्व के 192 देशों में भारतीय रहवास करता है वहां – वहां सुबह के नाश्ते का स्वादिष्ट रसास्वादन बिखेरता है पोहे का यह व्यंजन. तैयार पोहे के नाश्ते के साथ नमकीन, मसाला-बूँदी, बारीक कटा हुआ प्याज़, अनार फल के दाने और जीरावण का छिड़काव न केवल पोहे के श्रृंगार को द्विगुणित कर देता है बल्कि पोहा-साधक की जिव्हा में उपस्थित असंख्य लार-ग्रंथियों को कुछ इस प्रकार द्रवित कर देता है कि पोहे के पहले चम्मच से अंतिम चम्मच तक के स्वादिष्ट दौर में मस्तिष्क में कहीं उपस्थित संतुष्टि के केंद्र बिंदु में वह ताजगी, तरावट और तरंग तिरोहित होती है कि जिसे शब्दों में कह पाना लगभग असंभव है. जैसे गूंगे का गुड़ जो जुबान पर घुल तो जाए पर स्वाद कैसा, कहा न जाय.
कहने को तो पोहे, चावल को उपचारित करके बनाए जाते हैं मालवांचल के घरों में स्थान पाते हैं. परंतु कड़ाही में पोहे के पूर्व उपचारित होने से पूर्व लगभग 14 मसालों का श्रृंगार भोजनशाला में उपस्थित कर्मशील कर-कमलों से प्राप्त करते है तब कहीं जाकर यह पोहा जी आपकी जिव्हा पर उपस्थित स्वाद ग्रंथियों पर अपना स्वादिष्ट नृत्य प्रस्तुत करता है.
इंदौर की पह्चान पोहे का अल्पाहार है और पोहे से भी इंदौर की पहचान है. हालाँकि पिछले 2 दशकों में इंदौर नगर ने राष्ट्रिय स्तर पर अपनी पह्चान स्थापित करने के नए आयाम प्राप्त किए हैं और लगभग 1 दशक से तो स्वच्छता के नए मापदंड स्थापित कर देश का स्वच्छतम नगर बना हुआ है जहाँ प्रतिदिन लगभग 100 क्विंटल पोहा नागरिकों द्वारा उदरस्त कर लिया जाता है. आश्चर्य की बात तो यह है कि वहाँ एक ऐसा व्यंजन है जो सड़क चलते मज़दूर की भोजन-भूख शांत करने के साथ किसी भी कुलीन स्तरीय होटल के प्रातःकालीन निशुल्क दस्तरख्वान में भी उपस्थित है जहाँ वरिष्ठ और कनिष्ठ कारोबारी, नीति–नियंता और नौकरशाह की मेज पर भी मृदु, मनमोहक और मसालामय पोहा पाया जाता है. कढ़ाही में बनाने वाले इस व्यंजन के अनिवार्य तत्वों में चपटे चावल याने पोहे की स्वादिष्ट यात्रा में सम्मिलित होते है, कढ़ी-पत्ता, सौंफ, ज़ीरा, राई, प्याज़, लॉन्ग, हरी मिर्च, धनिया, हल्दी और ज़रा सा तेल. अनार दाना, मूंगफली, चाट मसाला, नीबू, काजू और किशमिश, पनीर के टुकड़े भी यदा-कदा स्वाद अनुसार पोहे में प्रस्तुत होते रहते हैं.
पोहे को नागरिकों कि वह स्वीकार्यता प्राप्त है वह अल्पाहार की श्रेणी में कदाचित ही किसी अन्य नाश्ते को प्राप्त होगी, जो पोहा-प्रेमी नागरिक प्रतिदिन सुबह बिना नागा किए प्राप्त करते हैं. और तो और ऐसे भी उदाहरण प्राप्त है कि इंदौर से बाहर की लंबी यात्रा उपरांत इंदौर पहुँच के हवाई अड्डे या रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर घर पहुँचने से पहले अपने निर्धारित पोहा-विक्रेता के द्वार पर उपस्थित हो प्रिय पोहे को गले लगाया है और उसके बाद ही घर की ओर रुख किया है.
पोहे के खांटी प्रेमी पोहा व्यंजन की प्रथम श्रेणी से ऊपर उठकर ऊसल पोहे के प्रशंसक होते हैं जो पोहे के प्रति उनके उच्चतर प्रेम को प्रदर्शित भी करता है. ऊसल-पोहे, अल्पाहार की वह श्रेष्ठतर श्रेणी है द्रव रूप में अंकुरित मसाला मोठ या बरबटी की फली के बीज से बने शोरबा का पोहे में समावेश से किसी भी चटोरे–साधक को मसालेदार नाश्ते से तरबतर कर देती है. ऊसल-पोहे के स्वाद का विकास करने में लोगों को समय लगता है परंतु एक बार यदि यह स्वाद विकसित हो जाए तो वह पक्का इंदौरी हो जाता है.
नाश्ते में पोहा-पुराण, अपने आप में एक पूर्ण गाथा है जो प्रतिदिन सुबह रसोईघर में लिखी जाती है और स्वाद-ग्रथियों द्वारा पढ़ी जाती है. घर की गृहणियां अपनी सुबह को, परिवार के लिए इसके प्रस्तुति करती हैं, वहीं पूरा शहर दिनभर पोहे के छोटे रेस्टोरेंट या ठेलों पर पोहा नामक लैला के लिए मजनूं बने फिरते हैं. अब तो ऑनलाइन प्लेटफार्म के माध्यम से भी पोहा प्लेट की डिलीवरी हो रही है जो प्रेम का प्रतीक है पोहे के प्रति. जिसने एक बार पोहा चख लिया वह पोहे के प्रेम में आकंठ डूबने से बच नहीं सकता है.

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