धन क्या ख़तरनाक जीव है ?
या मात्र एक कमोडिटी !
धन कमाने की लालसा अवश्य ख़तरनाक मानस है जिसके चलते खाँसी की दवाई में सम्मिलित किए जाने वाले तत्वों की मात्रा का ध्यान नहीं रखा जा सका और किडनी फेलियर होने से 16 बच्चों की असामयिक मृत्यु हो गई !
कहना आसान है कि तंत्र दोषी है और मुझे प्रतीत होता है कि धन लोलुपता का भाव हमारे चरित्र को न केवल मलिन कर देता है बल्कि नैतिकता से परे भी धकेल देता है.
धन बुरा नहीं है धन की लालसा भी बुरी नहीं है परंतु अत्यधिक और अपराधिक धन संग्रहण करने की लालसा एक विचित्र मानसिक रोग की परिचायक है जिससे कमोबेश मायालोक में उपस्थित प्रत्येक साधु असाधु व्यक्ति पूर्ण रूप से पीड़ित है.
सच हो शायद?
क्या धन अनैतिक है या धन अर्जन की मानसिकता!
आश्चर्य होता है न कि सड़क या घर के छत पर जीवों को डाले गए अनाज के दाने बिस्किट इत्यादी का सेवन करने के लिए जीव द्वारा जितनी भूख हो उतने ही ग्रहण किए जाते हैं और भूख समाप्त होते ही ये जीव अपने गंतव्य को लौट जाते हैं चले जाते हैं और शेष भोजन तत्व वहीं पड़ा रह जाता हे.
परिग्रह अर्थात संग्रह करने की यह कला, प्रकृति ने कदाचित मानव प्रजाति को होगी प्रदान की है जो माया के वशीभूत हो धन लोलुपता में अनैतिक कर्मों का सहारा लेकर भी अधर्म से धन को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत होता है जो क्षण भंगुर है और अस्थाई है कि सदा न रहने वाला है
आश्चर्य का विषय है कि यह नैतिक कथन कि मानव की यह प्रजाति आरंभ से ही जानती है परन्तु फिर भी भ्रष्टाचार अंक के लिए भ्रष्ट आचरण के लिए न केवल उद्यत होती है निरंतर करती चलती है और सबसे आश्चर्य की बात यह है कि सामाजिक नैतिक पतन के चलते हैं समाज का कोई भी व्यवसाय सेवा व्यवसाय सेवा धर्म भ्रष्टाचार की प्रतियोगिता से अछूता नहीं है न जाने कहां को हम जा रहे हैं यह जानते हो हुए कि हम रास्ता तो भटकी चुके हैं और जीवन साँप सीढ़ी के खेल की तरह चल रहा है जहाँ सीढ़ियों के माध्यम से मोक्ष गामी होने को हम हामी ही नहीं हैं और साँप जैसा विषैला मन अपने प्रभाव को निश्चित तौर पर विषैला समाज बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं.
हमारा यह संसार कुत्ते है कि टेडी पूछ के समान है सैकड़ों वर्ष से लोग इसे सीधा करने का प्रयास कर रहे हैं परंतु ज्यों ही वे इसे छोड़ देते हैं त्यों ही वह दुम टेढ़ी की टेढ़ी हो जाती है – Swamy Vivekananda
आत्म मंथन कीजिएगा!

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